CAA, NCR और NPR द्वारा दलितों को पुनः गुलाम बनाने की चाल


भारत में पिछले कुछ समय से CAA, NCR और NPR के विरुध देश भर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. शुरु में लग रहा था कि संघी सरकार ने अपने एजैंडे के अनुसार यह ’’मुस्लिम-विरोधी’’ कानून बनाए हैं परन्तु एक दिन अचानक मेरी नजर एक अदालती फैसले के समाचार पर पड़ी. खबर पढ कर यकीन मानिए मेरा रोम रोम सिहर उठा. हो सकता है यह मेरा वहम हो परन्तु मैं आपके साथ अपने विचार सांझा कर रहा हूं. उस समाचार से पहले यह कानून क्या हैं, यह समझ लेते हैं.
यह कानून क्या हैं?

1. राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) 2003 में वाजपेयी की बीजेपी सरकार ने श्ुारु किया था. इस में समय समय पर उन लोगों का विवरण भरा जाता है जो भारत में पिछले 6 महीने से निवास कर रहे हों. उस समय सरकार की योजना थी कि NPR के आधार पर नागरिकता कार्ड दिए जाएंगे. यह जनगणना रजिस्टर ब्मदेने से अतिािक्त है जिसमें हर 10 के सालों बाद भारत में रहने वाले लोगों का विवरण दर्ज किया जाता है. 2011 तक की जनगणना इस रजिस्ेटर में शामिल है. अब 2021 की जनगणना इस में दर्ज की जानी है. उस से पहले सरकार NPR रजिस्टर अप्रैल 2020 से अपडेट करना चाहती है. बीजेपी सरकारों की बेवकूफी की यह एक मिसाल है कि दोनों रजिस्टरों की सूचनाएं इतनी मिलती हैं कि स्वयं रजिस्ट्रार जनरल ने इन दोनों रजिस्टरों को गडमड कर दिया है.

2. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) वस्तव में नागरिकता कानून 1955 में किया गया एक संशोधन है कि अब पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश से 31-12-2014 से पहले आए वहां के नागरिकों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी बशर्ते उन का धर्म हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई या पारसी हो. इन तीनों देशों के मुस्लमान या अन्य धर्म के लोग भारत के नागरिक नहीं बन सकते. शेष अन्य देशों से आए हुए लोगों पर यह संशोधन लागू नहीं होगा चाहे वह हिन्दू ही क्यो न हों.

3. राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) एक ऐसा दस्तावेज है जिस में नाम दर्ज करवाना हर भारतीय के लिए अनिवार्य होगा. जिस व्यक्ति का नाम इस रजिस्टर में दर्ज हो गया उसे भारत का नागरिक मान लिया जाएगा. इस रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने लिए हर व्यक्ति को निम्नलिखित 14 दस्तावेजों में से कम से कम एक प्रमाण देना अनिवार्य होगा. यह कागज सरकार द्वारा ’’घोषित तारीख’’ से पहले के बने होने चाहिए. जिस व्यक्ति पास आवश्यक कागज नहीं है उस को विदेशी घुसपैठीया माना जाएगा और उस को जेल (detention center) में धकेल दिया जाएगा. यह 14 दस्तावेज हैंः

1. उस का या उस के बाप दादा का नाम 1951 के जनगणना रजिस्टर ;ब्मदेनेद्ध में दर्ज हो. या घोषित तारीख को इन में से कोई दस्तावेज बनवा रखा होः 2. वोटर लिस्ट में उस का नाम हो. 3. जमीन की रजिस्ट्री, जमाबंदी हो. 4. बैंक, डाकखाने में उस के नाम खाता हो. 5. किसी स्कूल का प्रमाण-पत्र हो. 6. अदालती कार्यवाई के रिकार्ड में उस का नाम हो. 7. उस के नाम पर जीवन बीमा पाॅलिसी हो. 8. नागरिकता प्रमाण-पत्र हो. 9. स्थाई निवासी प्रमाण-पत्र हो. 10. शरणार्थी प्रमाण-पत्र हो. 11. जन्म प्रमाण-पत्र हो. 12. पासपोर्ट हो. 13. सरकारी नौकरी करने का प्रमाण-पत्र हो. 14. कोई अन्य ऐसा स्वीकार्य प्रमाण-पत्र हो.

अब तक सरकार ने आसाम में यह रजिस्टर बनाया है और वहां 24-03-1971 को ’’घोषित तारीख’’ माना गया था अर्थात इन दस्तावेजों में से कोई एक दस्तावेज 24-03-1971 से पहले का बना होना अनिवार्य था. अब अमित शाह ने संसद में घोषणा की है कि पूरे भारत में NRC लागू किया जाएगा. इस लिए घोषित तारीख क्या होगी, उस की अभी घोषणा नहीं की गई है.

फिर डरने की क्या बात है?

पहली नजर में इन कानूनों में कोई अच्छाई/बुराई नजर नहीं आती. हां, CAA में जरुर मुस्लिम-विरोधी अंश नजर आता है परन्तु सरकार का कहना है कि जिन 3 देशों के हिन्दूओं को नागरिकता देने की बात CAA में की गई है वह तीनों देश मुस्लिम देश हैं और वहां हिन्दूओं पर जुल्म होते हैं. यह अलग बात है कि मौजूदा बीजेपी सरकार आने के बाद भारत के मुस्लमानों पर अन्याय होने के मुद्दे पर दुनिया भर में चर्चे हुए हैं मगर किसी ’’मुस्लिम देश’’ ने भारतीय मुस्लमानों को नागरिकता देने का कानून नहीं बनाया. मात्र भारत जैसे ’’धर्मनिरपेक्ष’’ देश ने धर्म-आधारित कानून क्यों बनाया, यह गंभीरता से विचारने की बात है.

यहां मुझे बाबा साहिब आम्बेडकर द्वारा संविधान के बारे में की टिप्पणी याद आती है जो इन कानूनों पर एकदम सटीक बैठती है. उन्होंने कहा था कि कोई कानून कितना भी अच्छा क्यों नाम हो अगर उस को लागू करने वाले शासक बदनीयत हैं तो वह कानून बुरा ही साबित होगा.

बाबा साहिब की यह बात वर्तमान लीडरों पर पूरी तरह लागू होती है जिन्होंने अपने दम्भपूर्ण बडबोलेपन द्वारा इन कानूनों पीछे छिपी हुई अपनी गन्दी नीयत का ढोल शरेआम पीटा है. उन के लल्लू पन्जू लीडरों ने ही नहीं मन्त्रीयों तक ने शरेआम भडकाउ बयानबाजी की है कि यह कानून बना कर भारतीय मुस्लमानों को पाकिस्तान भेजने का काम किया जाएगा. पहली नजर में यही लग रहा था कि इन संघीयों की यह ’’एन्टी-मुस्लिम’’ राजनीतिक शोशेबाजी है.

परन्तु एक दिन अचानक एक अदालती केस का समाचार सामने आया कि एक हिन्दू या दलित परिवार लम्बे समय से आसाम में बसा हुआ था. वहीं का जन्मा-पला था परन्तु उस के पास इन 14 में से कोई कागज उपलब्ध नहीं था. उन को जेल (detention center) भेजने की कार्यवाई की गई जिस के विरुध वह परिवार अदालत गया. उन की बात सुनने से बाद अदालत ने कहा कि उन को ’’घुसपैठीया’’ मान कर जेल भेजने की बजाए उन को ’’शरणार्थी’’ मान लिया जाए. जब वह परिवार 10 साल बतौर शरणार्थी भारत में रह लें तब उन को भारतीय नागरिकता देने की कार्यवाई की जाए.

देखने को यह मामूली सी खबर थी. ऐसा लगता है कि एक दयालु जज ने कानून के अनुसार न्याय किया है परन्तु वस्तव में यह फैसला यह दर्शाता है कि RSS और BJP इन कानूनों की आड़ में कितनी आसानी से भारत को निरोल हिन्दू-राष्ट्र बनाने का अपना घिनौना ऐजैंडा पूरा कर सकती है.

शरणार्थी बनाम नागरिक

अब जरा शांत दिमाग से इस फैसले के आदेशों पर गौर करें. सोचिए कि इन तीन कानूनों की आड़ में संघी कुनबा क्या कर सकता है. वास्तव में हुआ यह कि इन कानूनों की वजह से एक भारतीय परिवार अपनी जन्मजात नागरिकता गंवा कर अगले कम से कम 10 सालों तक बतौर शरणार्थी भारत में रहेगा!

1. नागरिकता गंवाने का अर्थ है कि ऐसे परिवार को सरकारी नौकरी के अयोग्य समझा जाएगा क्योंकि केवल भारतीय नागरिक को ही भारत में नौकरी करने का अधिकार होता है. अतः भारत के मूल नागरिक होने के बावजूद वह लोग शासन में हर हिस्सेदारी से वंचित कर दिए गए हैं.

2. और केवल नागरिक को ही नौकरी में आरक्षण मांगने का अधिकार होता है. शरणार्थी को नौकरी नहीं मिलती, आरक्षण कौन देगा. अतः जिन SC/ST/OBC/BC के पास यह दस्तावेज नहीं, उन के पूर्वजों ने बेशक सिन्धु सभ्यता की सृजना की हो, वह आरक्षण की तो बात ही छोडिए, मैरिट में हों तो भी नौकरी से बाहर हो जाएंगे. प्राइवेट नौकरी तो इन को नागरिक होने पर भी नहीं मिलती, शरणार्थी बन जाने पर कौन नौकरी देगा? अतः भारतीय संविधान द्वारा समानता का अधिकार पाए ’’शूद्र’’ फिर से सेवा करने ’’योग्य’’ ही बना दिए जाएंगे.

3. वोट डालने या चुनाव लडने का अधिकार केवल नागरिक को होता है. शरणार्थी को यह अधिकार नहीं मिलते. अतः ऐसे ’’शूद्र’’ चाहे कितना भी शोर मचा लें कि उन के बाबा साहिब ने संविधान बनाया है, उन्हें उन की ही संसद, विधान सभा के सदस्य बनने से ही नहीं पंच सरपंच बनने तक की मनाही हो जाएगी. फिर वहां बैठ कर संघी चाहें तो आरक्षण समाप्त करें या पूरा संविधान ही समाप्त कर दें, कोई विरोध करने वाला बचेगा ही नहीं. जैसे भांड शादी के मण्डप के बाहर खड़े हो कर गीत गाते हैं, अठावले जैसे चापलूस भी संसद के बाहर खड़े हो कर ही स्तुति-गान कर पाएंगे!!

4. संविधान की धारा 19 के अंतर्गत केवल भारतीय नागरिक को अपनी बात कहने, संगठन बनाने, जलसे जलूस निकाल कर अपना पक्ष रखने, भारत में कहीं भी आने-जाने या रहने, कोई भी मन मर्जी का व्यापार या काम करने का मौलिक अधिकार देता है. किसी भी शरणार्थी को यह अधिकार नहीं मिलते. अतः इन तीन संघी कानूनों द्वारा जितने भी ’’शूद्र’’ शरणार्थी बना दिए जाएंगे, उन को चुपचाप पेशवा के वारिसों का हर हुक्म मानना पडेगा. कोई चूं-चपड नहीं कर सकेगा.

5. सब से भयावह सच्चाई यह है कि आज देश को संघ चला रहा है और संघ कोई संस्था मात्र नहीं है बल्कि एक ’’विचार’’ या दर्शन हैं जिसकी नींव ही ऊंचनीच, अलगाववाद, घृणा व हिंसा से संक्रमित है. समानता, बन्धुता और स्वतन्त्रता उस के लिए घातक हैं. उन का लक्ष्य केवल ऊंचनीच आधारित (graded unequal) समाज स्थापित करना है.

आज केवल दलित समाज के विद्वान ही संघ की इस अमानवीय विचारधारा को धवस्त करने वाली नई विचारधारा प्रस्तुत कर पा रहे हैं. संघियों को केवल बौद्ध विचारधारा ही चुनौती दे पा रही है. अतः यह डर स्वाभाविक है कि जब इन तीनों कानूनों द्वारा भारतीयों की छटनी कर दी जाएगी तो बिना कागजों वाले दलित व बौद्ध लेखकों, विद्वानों, सामाजिक व धार्मिक कार्यकर्ताओं का वही हश्र होगा जो संकर के हाथों बौद्धों का हुआ था. नालन्दा तक्षशिला मोहनजोदाड़ो गया सांची इस की मिसाल हैं. इस बात की पूरी आशंका है कि पिछले सौ साल में दलितों ने जो उत्थान किया है उसे इन कानूनों द्वारा मटियामेट कर दिया जाएगा.

6. आज आधार कार्ड के माध्यम से सरकार हर व्यक्ति की नस नस से वाकिफ या जानकार है. कौन व्यक्ति किस संगठन, किस व्हटसप्प ग्रुप में शामिल है सरकार को सब पता है. अतः अगर संघीयों के पास दस्तावेज नहीं हुए तो वह तो ब्।ठ द्वारा तुरंत भारतीय नागरिक बना दिए जाएंगे परन्तु संघ-विरोधी दलित बौद्ध या मुस्लिम विचारक लेखक विद्वान तो पक्के तौर पर ’’घुसपैठिए’’ करार दिए जाएंगे. संघी अपने विरोधी विचारक और प्रचारक को खुला छोड ही नहीं सकते!!

7. पिछले 5-10 हजार साल से भारत देश सृजन वाले हम अपनी ही मातृभूमि पर गैर हो जाएंगे. आसाम में कुछ ऐसे भी केस हुए कि मां-बाप पास तो अपना सबूत नहीं दे पाए परन्तु उन के छोटे बच्चे भारत में पैदा होने के आधार पर भारतीय नागरिक माने गए. अतः मां-बाप को जेल में भेज दिया गया और बच्चों लिए मुसीबत खडी हो गई. अब कहीं ऐसे हुक्म जारी हुए हैं कि बच्चों को मां-बापसे अलग न किया जाए!!

संघी ताकतें ऐसा क्यों कर रही हैं?

यह संघी कुनबा एक खास मंसूबे के तहत ऐसा कर रहा है. अकेले आसाम में 19 लाख लोग वोट के अधिकार से विहीन कर दिए गए हैं. वहां 3 करोड की आबादी है. अर्थात लगभग 6% लोग वोट के अधिकार से वंचित कर दिए गए हैं. यह 6% की दर बहुत खास है जब हम देखते हैं कि एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल 3% वोट अधिक मिलने पर संघी कुनबा लोग सभा में 150 सीटें से सीधे 300 सीटें जीत गया. इन 6% में से जो संघी हैं उन को CAA द्वारा वापिस वोट का अधिकार दे दिया जाएगा. अतः बीजेपी की वोट बनी रह जाएगी.

सरकारी आंकडों के अनुसार भारत में 17% SC 8% ST और 15% मुस्लमान हैं. BC, OBC को एक पल के लिए छोड दें तो भी इन तीन की आबादी 40% है. इन लोगों की वोट में भी लगभग इतनी ही भागीदारी है. संघी सरकार लिए इन 40% में से 3% या 4% संघ-विरोधियों को शरणार्थी बना कर वोटर लिस्ट से निकालना क्या मुश्किल है. विपक्ष की 3% वोट कटी नहीं कि संघ की 300 सीटे पक्की!!

अतः संघी कुनबे की यह शातिराना चाल है कि कुछ हिन्दू तो इन तीन देशों से ला कर उन की वोट पक्की बना लीं जाएं और कुछ संघ-विरोधी भारतीयों को वोट के अधिकार से वंचित कर दिए जाएं. जैसे भी हो यह 300 सीटें पर कब्जा बना कर रखा जाए.

यह क्रोनोलोजी समझिए

अमित शाह ने एक शब्द का प्रयोग किया, क्रोनोलोजी जिस का अर्थ है घटनाओं का उन के घटित समय के अनुसार लेखा जोखा. उदाहरण के तौर पर पहले बाबर आया फिर हुमायूं फिर अकबर और आखिर में बहादुर शाह मुगल राजा हुआ. यह मुगल-राज की क्रोनोलोजी है. अमित शाह ने एक सभा में बोलते हुए अपने भक्तों को बताया कि इन कानूनों की क्रोनोलोजी को समझिए. हम पहले NPR में लोगों के नाम दर्ज करेंगे. कोई दस्तावेज नहीं मागेंगे. फिर पूरे भारत में NRC लागू करेंगे. सबुत मागेंगे. NPR में तो सब लोगों के नाम पहले ही दर्ज हो चुके होंगे. उन में से जिन्होंने सबूत दे दिए उन के नाम NRC में लिख लिये जाएंगे, शेष को घुसपैठिया करार दे दिया जाएगा. इन ’’घुसपैठीयों’’ में जो लोग संघी-हिन्दू हैं उन को ब्।ठ के द्वारा भारत की नागरिकता झट दे दी जाएगी. शेष बचे लोगों को जेलों में धकेल दिया जाएगा. किसी जज को रहम आ गया तो शायद जेल भेजने की बजाए ’’शरणार्थी’’ मानने के हुक्म दे दे. हर हाल में उन की वोट समाप्त हो ही जाएगी!!

इस तरह इन कानूनों की क्रोनोलोजी मुस्लमानों लिए तो खतरनाक है ही दलितों और आदिवासियों के लिए भी कम खतरनाक नहीं है. भारत के आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, अधिकतर चमार और वाल्मिकी ’’आदिधर्मी’’ हैं और खुद को हिन्दू नहीं मानते. बहुत से लोग नास्तिक हैं. इन सभी में से जिस के पास भी आवश्यक दस्तावेज नहीं मिले उस को चाहे जेल हो या न हो हो परन्तु वोट समाप्त होना पक्का है!! अतः चाहे सिन्धु सभ्यता काल से ले कर आज तक हम इस देश के वासी रहे हों परन्तु अगर हमारे पास यह कागज नहीं हैं तो हम अपने ही देश में घुसपैठिए करार दे दिए जाएंगे. उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत सच हो जाएगी.

क्या हमसरी अदालतों से न्याय की उम्मीद करें?

एक जुडीशल कहावत है कि न्याय देने में देरी करना स्वयं में अन्याय है. इस मामले में हमारी जुडिशरी दुनिया की सब से नाकारा संगठनों की सूची में शामिल है. यह न्याय करने की बजाए फैसले करती है और फैसले करने में भी कई बार तो आधी सदी लगा देती है. सुप्रीम कोर्ट के कई वकील यूटयूब पर दावा कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में आते ही यह CAA का कानून रद्द कर दिया जाएगा. परन्तु मुझे ऐसा नहीं लगता. कारण कोई भी हो सकता है.

साल भर पहले सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने कोर्ट से बाहर आ कर बयानबाजी की थी. लोगों को उम्मीद की किरण दिखाई दी थी कि शायद अब मोदी हकूमत पर कुछ नकेल डाली जाएगी परन्तु मुझे मोदी द्वारा दिया एक बयान याद आ गया. उस ने कहा कि उस पास हर किसी के कारनामों की फाइल है जिस ने भी चूं चपड की उसे सीधा कर दिया जाएगा. कौन उस के विरुध फैसला देगा? आपको क्या लगता है कि रिटायर होने से दो दिन पहले बाबरी मस्जिद की जमीन संघी संगठनों को देने का फैसला रुटीन का फैसला है?

और फिर जज अपनी मन मर्जी का फैसला देते हैं. इन्दिरा गांधी को कत्ल करने की साजिश करने के दोष में सतवंत सिंह के पिता को फांसी की सजा हाई कोर्ट तक ने कन्फर्म कर दी परन्तु सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उस को बिलकुल ही बरी कर दिया.
अब बाबरी मस्जिद केस में सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जो किया वह भी काबिले-गौर है. भारतीय पुरातत्व विभाग ने उस स्थान की खुदाई की और कहा कि यहां जो सामान मिला है उस से यह स्थान बौद्ध स्थल लगता है. अतः बौद्ध उस स्थान के वास्तविक मालिक हुए. इसी आधार पर बौद्धों ने पटीशन डाली परन्तु जजों ने कहा कि वह केवल झगडा कर रहे हिन्दू और मुस्लमान पक्षों की ही सुनवाई करेंगे. जजों ने माना कि बाबरी मस्जिद गिराना अपराध है परन्तु फिर भी वह जमीन ’’अपराधियों’’ को ही के दी गई!! जमीन के वास्तविक मालिकों अर्थात बौद्धों को पार्टी ही नहीं बनने दिया गया.

फिर ऐसे भी जज हैं जो सरकार को हुक्म देते हैं कि हिन्दूओं की गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घेषित जाए और ऐसे भी हैं कि केस कुछ और होता है और फैसला कर देते हैं कि ैब् ैज् आरक्षण में भी करीमी लेअर होनी चाहिए. अतः इन कानूनों बारे में क्या फैसला होगा, जज ही जाने!

एक अन्य केस है. एक जज का पिता भी सुप्रीम कोर्ट का जज होता था. पिता ने कोई फैसला दिया अब उसके बेटे जज बन कर वह फैसला पलट दिया और कहा कि मेरे पिता ने जो गलत की थी मैंने सुधार दी है. अतः कौन जज क्या फैसला करेगा, किसी को अन्दाजा नहीं.

अब दलितों के पास क्या उपाय है?

यह बहुत कठिन प्रश्न है. देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान राष्ट्रपति बिलकुल शांत बैठा हुआ है. देश जल रहा हो और राष्ट्रपति मौन धारण किए बैठा हो तो इस का अर्थ है कि उस के हाथ-पल्ले कुछ नहीं है. अतः दलित समाज को वहां से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. बहुत साल हुए ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति बनाए जाने पर बयान दिया था कि मैं इन्दिरा गांधी का धन्यवादी हूं कि मुझे राष्ट्रपति बना दिया. अगर वह मुझे झाडू मारने लिए कहतीं तो मैं वह काम भी खुशी खुशी कर देता. परन्तु जब देश-हित की बात आई, ज्ञानी जैल सिंह ने प्रधान मन्त्री राजीव गांधी के प्रैस बिल को मन्जूरी देने से इंकार कर दिया था. राष्ट्रपति राम कोविंद से ऐसी उम्मीद करना बिलकुल ऐसा होगा जैसे मई के महीने में दिल्ली में बर्फबारी होने की उम्मीद करना.

अठावले पासवान जैसे दलित लीडर संसद में खड़े हो कर मोदी-स्तुति गा रहे हैं. मायावती के कारनामों की फाइल मोदी पास रखी है. अतः मायावती से यह उम्मीद करना कि वह कुछ करेगी, पानी मथ कर मक्खन निकालने जैसा है. अब हमारे पास केवल शोशल मीडीया बचता है. हमें फिर से 2 अप्रैल दोहराने की जरुरत है और तब तक दोहराने की जरुरत है जब तक CAA और NRC पूर्णतया दफन न हो जाएं. अगर हम अब चुप रहे तो फिर से पेशवा युग आ जाएगा. अब हमारे स्थानीय लीडरों/कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वह लोगों को संगठित करें. मिलजुल कर स्थान स्थान पर जलसे जलूस करें. फिलहाल NPR की प्रक्रिया को एकजुट हो कर टालने की जरुरत है.

Author – कुलदीप हिसार

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