लोगों की हीरो थी फूलन देवी


आज ही के दिन 25 जुलाई, 2001 को “फूलन देवी” नामक एक वीरांगना की “शेरसिंह राणा” नामक सवर्ण व्यक्ति ने हत्या करदी, जो कि बताया जाता है कि उसे राजनीतिक षड्यंत्र के तहत भारत की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली “तिहाड़ जेल” से फर्जी जमानत पर इस घटना को अंजाम देने के लिऐ छोड़ा गया था।

फूलन देवी का जन्म उत्तरप्रदेश के जालौन जिले के ग्राम गोरहा का पूरवा में काफी गरीब परिवार में “मल्लाह जाति” में हुआ था, उनके पिताजी का नाम “देवी दीन” और माता “मूलाबाई” थी।

फूलन जब ग्यारह वर्ष की हुईं तो उनके चचेरे भाई “मायादीन” ने उनकी शादी तकरीबन 31 वर्ष के “पुत्तीलाल” नामक व्यक्ति से करा दी। उनका पति उनको अक्सर प्रताड़ित करता था तथा चूंकि वो कम उम्र की थी तो शारीरिक संबंध बनाने के लिए भी तैयार नहीं थी पर उनका बेरहम पति जबरन संबंध बनाता था तो उन्होंने तंग आकर पति का घर छोड़ दिया और वापस अपने घर आ गईं।

उनका विद्रोही स्वभाव यहीं से उनके अंदर पनप गया था, उन्होंने घर आ जाने के बाद मजदूरी भी करना शुरु करदी पर गांव के ठाकुरों की गंदी नजर उनपर पड़ने लगी, इसी के चलते उन ठाकुरों ने फूलन के साथ उनके परिजनों के सामने ही सामूहिक दुष्कर्म किया।

इस तरह के सामाजिक और शारीरिक अत्याचार फूलन को बहुत कम उम्र में सहन करने पड़ गऐ। यहाँ तक कि गांव के ठाकुरों ने उन्हें चोरी के झूठे इल्जाम में पुलिस से भी पकड़वा दिया और वहाँ बैठे सवर्ण पुलिसकर्मियों ने भी फूलन के साथ बलात्कार किया।

पुलिस हिरासत से छूट कर जब वो घर आयीं तो ठाकुरों ने “बाबू गुज्जर” नामक डकैत को फूलन देवी की सुपारी दे दी। उसके बाद डकैत फूलन का अपहरण करके ले गऐ, तो गुट का सरदार बाबू गुज्जर ने भी फूलन के साथ दुष्कर्म किया, हालांकि उसी गुट के एक सदस्य “विक्रम मल्लाह” ने गुज्जर को यह सब करने के लिऐ रोका भी पर वो नहीं माना।

इसी वजह से जब बाबू गुज्जर ने फूलन के साथ दौबारा दुष्कर्म करने की कोशिश की तो विक्रम मल्लाह ने उसकी गोली मारकर हत्या करदी और स्वंय उस गुट का सरदार बन गया। विक्रम मल्लाह डकैत होते हुऐ भी महिलाओं और बच्चों पर जुल्म-जाति किये जाने के सख्त खिलाफ था।

इसके बाद फूलन और विक्रम मल्लाह आपस में प्रेम करने लगे और साथ रहने लगे। जिसके बाद फूलन ने अपने पति से बदला लेने की ठानी और विक्रम के साथ ससुराल पहुँचकर पुत्तीलाल को घर से बाहर खींचकर पूरे गांव में गधे पर बिठाकर घुमाया और मारा भी। साथ ही पूरे गांव में ऐलान कर दिया कि यदि किसी ने भी अपनी बच्ची का “बालविवाह” किया तो उसका हाल भी इसी तरह होगा।

दूसरी तरफ ठाकुर “श्रीराम” जेल से रिहा हो गया जो कि बाबू गुज्जर के समय से इसी गुट का सदस्य था। वो जेल से छूट कर वापस गुट में आ गया तो उसकी भी गंदी नजर फूलन पर पड़ी और दूसरी तरफ उसे यह भी लगने लगा था कि ठाकुरों का वर्चस्व खत्म हो गया है इस मल्लाह की वजह से गिरोह में।

फूलन को हथियाने और जातीय दंभ के कारण श्रीराम ने विक्रम मल्लाह को छुपकर गोली मार दी, पर फिर भी फूलन ने उसे समय पर डॉक्टर द्वारा इलाज कराकर बचा लिया। इस बार तो विक्रम की मृत्यु टल गयी पर अगली बार श्रीराम ने फिर से धोके से आकर विक्रम पर गोलियों की बौंछार कर दी और फूलन को अपने साथ उठा ले गया।

श्रीराम के साथ उस वक्त एक महिला भी थी जिसका नाम “कुसुम” था उसी ने फूलन के शरीर से सारे आभूषण-गहने उतारे और उसके बाद उसी महिला ने फूलन के कपड़े फाड़कर उन बहसी लोगों के सामने छोड़ दिया। श्रीराम और उसके साथी फूलन को नग्नावस्था में ही रस्सियों से बाँधकर नदी के रास्ते “बेहमई” गांव में ले गऐ थे।

वहाँ पर उन जालिमों ने फूलन को पूरे गांव में नग्नावस्था में घुमाया पर किसी भी सवर्ण महिला ने इसके खिलाफ बोलने के बजाय तमाशबीन होकर देखती रहीं। फूलन को अबतक इस गांव का नाम भी नहीं पता था।

बेहमई गांव में ही श्रीराम और उसके साथी तथा गांव के लोगों ने फूलन का बलात्कार किया। लाठियों से फूलन को मारकर घायल भी कर दिया। कई दिन तक वहाँ उनके साथ यही सब होता रहा।

इसके बाद किसी की मदद मिलने पर वो वहाँ से निकल आयीं और उसके बाद विक्रम मल्लाह के मित्र “मानसिंह” से मिलकर नया गिरोह बनाया। उन्होंने सीधा सवर्णों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया था। बाद में जब वो श्रीराम की मुखबरी मिलने के बाद बेहमई गांव पहुँची तो उन्होंने उस कुए को भी पहचान लिया जिससे ठाकुरों ने नग्नावस्था में पानी लाने के लिऐ कहा था।

उन्हें यकीन हो गया था कि उन्हें इसी गांव में रखा गया था और यहीं के लोगों ने उन्हें यौनिक-शारीरिक प्रताड़ना दी थी। उन्होंने पूरे गांव के पुरुषों को घर से बाहर खिंचवा लिया और कुछ लोगों को भी उन्होंने पहचान लिया जिन्होंने उनके साथ बलात्कार किया था और लाइन से लगभग 30 ठाकुरों को खड़ा करके गोलियां चला दीं जिसमें से 22 ठाकुर तो तुरंत मर गये।

इस घटना के बाद यूपी ही नहीं सारे देश में तहलका मच गया, राजनीति में भी काफी हंगामा हो गया। सरकार ने फूलन को पकड़ने के सख्त आदेश दे दिये पर यूपी और एमपी की पुलिस उन्हें पकड़ने में नाकामयाब रही, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री “इंदिरा गांधी” ने सरेंडर करने को कहा जिसे फूलन देवी ने अपने साथियों को मृत्युदंड न देने व उन्हें 8 साल से अधिक सजा न दी जाये, उन्हें खुली जेल में रखा जाये तथा उनके परिवारजनों को जमीन दी जाये इन शर्तों को मान लेने के बाद लगभग दस हाजर लोगों के सामने सरेंडर करने को तैयार हो गयीं।

इसके बाद वो लगभग 11 साल की सजा काटकर 1994 में जेल से रिहा हुईं, उसके बाद उन्होेंने़ “बौद्ध धर्म” अपनाकर बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर जी का प्रबुद्ध भारत बनाने के सपने को साकार करने में भी अपनी भूमिका निभाई।

फूलन देवी बाद में समाजवादी पार्टी की तरफ से 1996 में मिर्जापुर सीट से चुनाव भी लड़ीं और सांसद भी बनी।

फूलन देवी ने कभी भी खुद पर हुऐ जुल्म, अत्याचार और अमानवीय व्यवहार को चुपचाप नहीं सहा और ना ही उन्होनें कभी खुद को कमजोर महसूस होने दिया बल्कि वो और अधिक मजबूत होती गयीं। उनमें एक गजब का आत्मबल था।

उनके साहस को जितना सराहा जाये उतना कम है, निश्चय ही फूलन देवी का सारा जीवन ही संघर्ष और साहस की मिसाल है। सभी को खासकर महिलाओं को उनके जीवन से प्रेरण लेनी चाहिऐ।

लेखक – सत्येंद्र सिंह

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