हिंसा के लिए कोर्ट को जिम्मेदार बताने वाले नेता नगरी अदालत की अवमानना के असली गुनहगार है


Share

सीबीआई की पंचकूला अदालत ने जैसे ही ढोंगी बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार का अपराधी ठहराया वैसे ही पंजाब और हरियाणा में बलात्कारी बाबा के भक्तों ने कानून अदालत तथा संविधान को ठेंगा दिखाते हुए आतंक का माहौल बना दिया। सैकड़ों बसों को जलाकर राख कर दिया गया, आम जनमानस से लेकर पत्रकार बंधुओ तक पर  जानलेवा हमला किया गया, सैकड़ों करोड़ों संपत्ति को तहस-नहस कर आग के हवाले कर दिया गया, 30 से अधिक मासूमों की जाने चली गई है लेकिन इन सब के बावजूद धर्म के आधार पर अपना दुकान चला रहे नेताओं की बेतुकी बयानबाजी इंसानियत के चेहरे पर गहरा तमाचा मारती है।

क्या हिंसा के लिए अदालत भी जिम्मेदार?

तत्कालीन हिंसा प्रकरण में शामिल भक्तों को आधार बनाकर कई नेताओं ने अदालत को खुली चुनौती देते हुए हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया तथा उनकी बयानबाजी एक तरह से अदालत के फैसले को सांप्रदायिक रंग देते हुए नजर आई। भाजपा नेता तथा सांसद साक्षी महाराज भारतीय राजनीति के एक ऐसे ही नेता हैं जो चर्चा में आने के लिए कुछ भी अनाप शनाप बकते रहते हैं। मीडिया भी साक्षी महाराज के बयान को केंद्र बिंदु बनाती है। दरअसल आम आवाम के दुख दर्द से बेखबर इस तरह के नेता लोगों का बयान आता ही इसीलिए है ताकि असली चर्चा के विषय को नजरअंदाज किया जा सके। साक्षी महाराज ने अदालत को गलत ठहराते हुए हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया। बात को आगे बढ़ाते हुए साक्षी महाराज यहां तक नहीं रुके बल्कि उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से अदालत को भारतीय संस्कृति पर षड्यंत्र रचने का आरोप भी लगाया। आइए जरा साक्षी महाराज के बयान पर एक नजर डालते हैं:

1- एक शिकायतकर्ता सही है या बाबा के करोड़ो भक्त गलत?
2- इस पूरे हिंसा तथा नुकसान के लिए कोर्ट भी जिम्मेदार है।
3- राम रहीम तो सीधे साधे हैं इसलिए कोर्ट ने उनको तो बुला लिया
4- कर्नल पुरोहित के साथ क्या हुआ? प्रज्ञा भारती ठाकुर के साथ क्या हुआ? ये योजना बद्ध तरीके से ये साधु-सन्यासी नहीं, (अदालत का) भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का षडयंत्र है.”
5- एक आदमी यौन शोषण का आरोप लगा रहा है। पूर्वाग्रह भी हो सकता है। कुछ लोभ लालच भी हो सकता है।

Read also:  दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक नहीं बन सकते दलित राष्ट्रपति के अंगरक्षक

क्या अदालती इंसाफ का यह जातिवादी चेहरा है?

अब एक प्रमुख सवाल यह उठता है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय को जस्टिस कर्णन द्वारा प्रधानमंत्री को भेजे गए 20 जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार संबंधी एक पत्र से इतनी बोखलाहट हो गई थी कि सर्वोच्च न्यायालय के उन्ही सात जजों की पीठ ने जस्टिस कर्णन के खिलाफ एकतरफा कार्यवाही करते हुए जस्टिस कर्णन के आरोप को अदालत की अवमानना माना था। लिहाजा जस्टिस करनन को 6 महीने के लिए जेल की सजा हुई। वर्तमान में जस्टिस कर्णन को गिरफ्तार कर जेल के हवाले कर दिया गया है। सांसद ने अदालत को भी हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया लेकिन वही सर्वोच्च न्यायालय, वही उच्च न्यायालय, वही अदालत आज क्यों मौन है? आखिर क्यों? जस्टिस कर्णन प्रकरण पर स्वतः संज्ञान लेने वाली अदालत क्या आज असहाय है एक सांसद पर अदालत की अवमानना नोटिस जारी करने के लिए? आखिर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 तथा अनुच्छेद 215 का सही अनुपालन कब होगा जो कि अदालत की अवमानना करने वालों को दंडित करने की बात करती है। माननीय अदालत को समय रहते इस मसले पर संज्ञान लेना चाहिए वरना इंसाफ का जातिवादी चेहरा मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है। और आपको?

Read also:  सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हुए हमले की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट

-सूरज कुमार बौद्ध
(लेखक भारतीय मूलनिवासी संगठन के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

Sponsored Content

+ There are no comments

Add yours