1945 में वित्त बिल पर बहस हुई तो डॉ. अंबेडकर जी ने शिकायत के तौर पर किस तरह गरज कर कहा


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बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एक विशेष जाति के हित संवर्धन का कार्य करता है। एक कायस्थ लड़की को इसके धर्मशास्त्र विभाग ने प्रवेश नहीं दिया। 1916 में इसके कॉर्ट ने गैर-ब्राह्मण को हिन्दू घर्म के प्रोफेसर के रूप में काम नहीं करने दिया। जब देश में हर कोई राष्ट्रीयता की बात करता है तो कुछ लोग धार्मिक मदांधता की बात करते हैं। उन्होंने चुनाव के दौरान आगरा, कानपुर, मद्रास, नागपुर, लुधियाना, बंबई आदि जगहों पर अनुसूचित जातियों के उम्मीदवारों के साथ हिन्दुओं द्वारा किए दुर्व्यवहार, मारपीट, घरों को जलाने जैसी कई घटनाओं का जिक्र किया।

इसी बीच उन्होंने कहा कि अनुसूचित जातियों के लिए मंदिर प्रवेश बिल केन्द्रीय विधानसभा में लाया गया तो वायसराय ने अनुमति नहीं दी। इस पर कुछ हिन्दू लोग उपवास पर बैठ गए, आत्महत्या की भी धमकी दी गई। लेकिन वायसराय ने जब अनुमति दे दी तब क्या हुआ? इन्हीं महापुरुषों ने बिल की धज्जियां उड़ा दी। इसे फाड़ा गया, तिरस्कृत किया गया। बेचारे रंगा अय्यर जो इस बिल के जनक थे देखते रह गए। उन्होंने आगे कहा कि 1916 में मानेक जी दादा भाई ने सदन में प्रस्ताव रखा था कि दलितों की शिकायतों की जाँच के लिए समिति गठित की जानी चाहिए लेकिन हमारे एक हिन्दू नेता ने इसका जबरदस्त विरोध किया था जिनके बेटा अब सदन के सदस्य हैं। दूसरी बार जब 1927 में स्वर्गीय लॉर्ड बर्केनहेड ने जब संबिधान के अंतर्गत अनुसूचित दलित जातियों को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा देने का सबाल उठाया था उसका भी इस हिन्दू नेता ने विरोध किया।

बाबासाहेब ने आगे कहा कि मेरे मित्र मेरा अस्तित्व तभी समझते हैं जब मैं राजनीतिक विषयों पर बोलता हूँ। जब मैं अनुसूचित जातियों के लिए बोलता हूँ, जब मैं नौकरियों में संरक्षण की बात करता हूँ, जब मैं उनके लिए शिक्षा अनुदान की बात उठाता हूँ, तब वे मेरा अस्तित्व जानते हैं, अन्यथा मैं उनके लिए एक मृत व्यक्ति की तरह हूँ।

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वो हमें हिन्दू बताते हैं जबकि समस्त सामाजिक और राजनीतिक अधिकार छीन लिए गए हैं। मैं अपने हिन्दू मित्रों को बता देना चाहता हूँ कि हम उनकी दया पर जिंदा नहीं हैं। हमें उनसे दया की भीख नहीं चाहिए। मैं इस देश का नागरिक हूँ। अपने दलित भाईयों के लिए सरकार के कोष से मैं उन सब अधिकारों और फायदों के लिए सहायता की माँग कर सकता हूँ, जिन्हें प्राप्त करने के लिए अन्य जातियाँ प्रयत्नशील रहती हैं। हमें किसी की खैरात नहीं चाहिए, खैरात तो इंसान को गुलाम बनाती है, मुझे और मेरे समाज को नैतिक पतन का कारण बन सकती है। अनुसूचित जातियाँ अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं। मैं सदन को बताना चाहता हूँ कि अगर हमारी मांगो का विरोध किया गया तो हम अपने अधिकार पाने के लिए खून भी बहाने को तैयार हैं।

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Author – Satyendra Singh

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1 comment

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  1. 1
    Dr.Berwa

    Dear Mr. Satyender Singh, you seems to be a pretty knowledgeable person . Picking on last line of Dr.Ambedkar.Are we so called Dalit?Bahujan willing to spill our blood for our causes today?
    Finally you are doing a good public service by writing these note, these rich in the contents.

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