31 जुलाई – दो दिग्गज बहुजनों का परिनिर्वाण दिवस है, शहीद उधम सिंह तथा मोहम्मद रफ़ी साहेब


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एक – शहीद उधम सिंह जिन्होंने जलियांवाले बाग़ में हुए बहुजनों के नरसंहार का बदला जनरल ओ’डवायर को मार कर लिया. वह इस काण्ड के प्रत्यक्ष गवाह थे. यहाँ इस बात को रखना भी ज़रूरी है कि 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाले बाग़ में वह भीड़ जिन्हें बंदूकों का निशाना बनाया गया वह प्रथम विश्व युद्ध में बचकर लौटे बहुजनों की थी.

जिन्होंने ज़िंदा लौट आने पर हरिमंदिर साहेब के दर्शन करने की जिज्ञासा थी, लेकिन उन्हें घुसने नहीं दिया. तब वह हरिमंदिर साहेब के नज़दीक स्थित जलियांवाले बाग़ में इकठ्ठा हुए थे. इस सामूहिक हत्या के बाद अकाल तख़्त के जत्थेदार ज्ञानी अरूर सिंह ने जनरल ओ’डवायर को सिरोपा (सम्मान स्वरूप भेंट) पेशे-नज़र किया.

ब्राह्मणवादी इतिहास ने इस पूरे किस्से पर राष्ट्रवादी मुलम्मा चढाते हुए इसे गोरों के खिलाफ एक भारतीय का विरोध बताया है. बहरहाल, उधम सिंह ने अपने बहुजन परिवार पर बरसे इस कहर का बदला लन्दन में जाकर लिया. यह सफ़र कठिनाइयों से भरा था. इसी दिन 1940 को उन्हें फांसी दी गई.

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दूसरे – महान फनकार मोहम्मद रफ़ी साहेब जिन्होंने अपनी आवाज़ से नगमों को न केवल जिंदा किया, बल्कि अमर कर दिया. लगभग 8000 गाने उनके गले से संवरे. अमृतसर के एक गाँव ‘कोटला सुल्तान सिंह’ में पैदा हुए रफ़ी साहेब बचपन में गाँव से गुजरते एक फ़कीर के गीत को हुबहू नक़ल करके गाँव के लोगों को सुनाते थे.

यह स्वर आगे चलके पूरी दुनिया में गूंजा. जनाब रफ़ी साहेब ने हिंदी के सिवा पंजाबी, कोंकण, उर्दू, मैथिलि, मराठी, गुजराती, तेलुगु, उड़िया, भोजपुरी, सिन्धी, कन्नड़ा, मगधी और भोजपुरी इत्यादि भाषाओँ में गाया.

बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अंग्रेजी, डच और फारसी भाषा में भी गाया. मुझे ज्ञान नहीं कि उन्होंने और कितनी भाषाओँ में गाया है. खैर, यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि अपनी निजी जुबान पंजाबी को अर्पित रफ़ी साहेब ने अपने पंजाबी भाषा में गाये गीतों के लिए शायद ही कभी मेहनताना लिया है. इसी दिन 1980 को हार्ट अटैक के चलते वह मृत्यु को प्राप्त हुए.

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दोनों के बारे में बहुजन दृष्टिकोण से पढना चाहिए.

लेखक – गुरिंदर आजाद 

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    प्रज्वलित मोटघरे

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