जान से प्यारे गणतंत्र, विश्विद्यालयों में सब ठीक नहीं है


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लेख को शुरू करने से पहले इस राष्ट्र में कुछ न भुलाई जा सकने  वाली, बोली और लिखी गयी बातो को आपको पुनः याद दिलाना चाहता हूँ, मैं चाहता हूँ आप इस बार या भविष्य में जब भी भारत के गणतंत्र दिवश के जश्न में शामिल हो तो अतीत में घटित उम्मीद से जुडी उन घटनाओ को, आपको लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदार बनाने वाली उन बातो को एक बार याद कर खुद से कुछ सवाल जरूर पूछे !

देश को ब्रितानी हुकूमत से मिली आज़ादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ये शब्द

“हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था, और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह ना सही, लेकिन बहुत हद्द तक। आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नयी सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है, और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है। ये एक संयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ खुद को भारत और उसकी जनता की सेवा, और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने के लिए प्रतिज्ञा ले रहे हैं ।“

बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर का संविधान निर्माण के बाद संविधान लागु होने के पहले का अपने भाषण का वो आखिरी चंद  लाइन जिसे उन्होंने चेतवानी के रूप में उपस्थित लोगो और सम्पूर्ण राष्ट्र के लोगो को बता कर चेताया था

” 26 जनवरी, 1950 को हम विरोधाभासों के क्षेत्र में प्रवेश करने जा रहे है। एक तरफ जहाँ हमारे राजनीतक क्षेत्र में समानता होगी वहीँ हमारी परम्पराओं के कारण सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता बनी रहेगी। हमें इस अन्तर्विरोध को शीघ्रातिशीघ्र दूर करना होगा अन्यथा इस असमानता के शिकार लोग मुश्किल से बनाये गए इस राजनीति लोकतंत्र को ध्वस्त कर देंगे।

और

66  वे गणतंत्रत दिवश के चंद दिन पहले एक शोधार्थी (Rohith Vemula) का वो आखिरी लेटर जिसमे उसने सबको “गुड मार्निंग कहा, उसने कहा इस समाज में मनुष्य की कीमत उसकी फौरी पहचान और निकटम सम्भावनाओ में सिमट कर रह गयी है, मनुष्य को एक दिमाग की तरह देखा ही नहीं जाता है !”

देश आज़ाद हुआ, हमने लोकतंत्र की स्थापना की सहमति बनाई, हमने अपना संविधान बनाने की बात छेड़ी और उसे बनाया भी, एक ऐसा संविधान जो सम्पूर्ण विश्व के लोकतान्त्रिक देशो के संविधान की तुलना में सबसे बड़ा और सबसे लचीला संविधान, वो संविधान जिसे  विश्व के  मानवतावादी अवधारणा को ध्यान में रख कर बनाया गया, एक संविधान जिसे बनाने में तत्कालीन समय के दुनिया के सबसे बड़े विद्वानों में एक बाबा साहेब के संग अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, बी.एन. राव, एस.एन. मुखर्जी के अथक प्रयासों  को जाता है !

लोकतंत्र की स्थापना  के साथ हमारे कुछ शिक्षित पूर्वजो का सपना था की भारत एक मानवीय दृश्टिकोण से एक बेहतरीन राष्ट्र बनने की और अग्रसर हो, वैज्ञानिक सोच से सम्मिलित संविधान के बलबूते ये विज्ञानं आधारित समाज की स्थापना  की जा सके, जिसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी संविधान के तहत विश्विद्यालयों को मिलने वाली थी जो आगे चल कर मिली भी, और उसके साथ शुरू हुआ विश्विद्यालयों के परिसर में वो खेल जो  अभी तक केवल  समाज में ही होता आया था क्योकि गणतंत्र क्व साथ ही समाज का निचला हिस्सा विश्विद्यालयों की तरफ रुख करने लगा , और जातिय दम्भ और बीमार मानसिकता से ग्रसित शिक्षा में एकतरफा अधिकार जमाये लोगो में ज्यादातर को  लोकतंत्र ये स्वाभाव बिलकुल नहीं भाया फलस्वरूप उन्होंने अपने सेवानिवृत होने तक यही जातिय  भेदभाव का  खेल जारी रखा !

विश्विद्यालयों के प्रोफेसरो का तमाम विचारधाराओ की तरफ जाना कदापि किसी तरह से अनुचित नहीं कहा जा सकता, क्योकि हमारे भारत के संविधान में ही तमाम विचारो का खूबसूरत मेल मिलाप दिखता है, आज़ादी के और लोकतंत्र स्थपना के नजदीकी दशक की बात करे तो ज्यादातर प्रोफेसर गाँधीवादी विचारो के आस पास दिखते हैं, समय गुजरने के साथ ये भटकाव समाजवाद, वामपंथ की तरफ भी बड़े रूप से  होता गया, हलाकि तब तक लगभग सारे प्रोफेसर कुछ उंगली पर गिनी जाने वाली जातियों समुदायों से ताल्लुक रखते थे, समय और बीता, बीसवीं सदी खत्म होने के कगार पर थी और शोषित समाज का सबसे निचला हिस्सा यानि राजनितिक सन्दर्भ में जिसे दलित बोलते उनकी कुछेक जातियों से कुछ लोग विश्विद्यालयों से पहली पीढ़ी के छोटे रूप में निकल प्रोफेसर्स के रूप में कुछ  गिने चुने विश्विद्यालयों में नियुक्त हुए, उन सबमे एक बात की समानता    उनकी गहरी शिक्षा के समय ये बनी  की वो आंबेडकर और उनके श्रेणी क्रम में आने ढेर सारे बहुजन समुदाय के पूर्वजो को  पढ़ और जान पाए जो समय बीतने के साथ समाज के साथ विश्विद्यालयों में बुद्ध और अम्बेडकर के विचारो को एक शब्द अम्बेडकरवाद  नाम से स्थापित करने हेतु आज भी जद्दोजहत में लगे हुए हैं !

समय के इस चक्र में कुछ ऐसा भी हो रहा था जिसे एक झटके के साथ समाज के लिए सही और खतरनाक दोनों में से किसी भी एक तरफ जा खड़े हो जाना बुद्ध जीवियो के लिए कदापि सरल नहीं रहा , ये था संघ की स्थापना के बाद संघ का भारत के सभी विश्विद्यालयों में घुसपैठ करना, हालांकि सवर्ण  जाति के एकतरफा कब्जे के कारन विश्विद्यालयों में ब्राह्मणवाद पहले से मौजूद था पर संघ के घुसपैठ के कारण ये केवल मजबूत नहीं हुआ बल्कि कभी कभार ठीक तरह से देखने पर पूरी तरह एहसास दिला देता की इसके कारण भारत के लोकतंत्र पर विश्विद्यालयों के जरिये ही कालिख पोतने का नापाक हरकत की कोशिश की जा रही, विश्विद्यालय परिसरों में गाँधीवादी समाजवादी वामपंथी इन विचारधाराओ से निकल कर संघ की विचारधारा के तरफ बहुत से प्रोफेस्सरो जो जातिय मानसिकता से ग्रसित थे उनका जाना हुआ !

ब्राह्मणवादी मानसिकता के प्रोफेसर्स का विश्विद्यालय परिसर में दखलंदाजी इस कदर खतरनाक है की संविधान के वैज्ञानिक दृश्टिकोण को ये कुचलता नजर आता  है, भारत के तमाम आई आई टी आई आई एम सहित राज्य और केंद्र के अधीन संचालित इंजीनियरिंग विज्ञानं मेडिकल चिकित्सा के संस्थानों में अन्धविश्वाश और पाखंड फलफूल रहा है, जिसका अंतः हम परिणाम देखे तो शून्य अविष्कारक इस देश में शून्य आविष्कार ही हो रहा है जिसपे देश की बड़ी मात्रा में भूखी नंगी जनता का टैक्स का पैसा लगा हुआ है !

यही नहीं कभी जाति देख कॉपी चेक करने का केस सामने आया तो कभी वाइवा और इंटरव्यू में जाति देख नंबर देने का प्रमाण मिला ! यही नहीं ऐसी मानसिकता के प्रोफेस्सोर्स विश्विद्यालयों के तहत लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाये अपने जाति समुदाय के छात्रों को शोषित समाज को मुख्य धारा से जोड़ने वाले अधिकारों के प्रति भटका असैंवधानिक कृत्यों को अंजाम  देने केस भी सामने आया  !

ब्राह्मणवाद की मजबूती के साथ विश्विद्यालय परिसर उन छात्रों के लिए कटीले साबित हुए जिन्होंने आंबेडकर को कॉलेज के शुरुवाती दिनों में पढ़ लिया और ब्राह्मणवादी मानसिकता से सीधे टकरा गए, ये उन छात्रों के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हुआ जो बेहद कमजोर  परिवार से आये थे, ये उन छात्रों को भी नहीं बख्शा जिन्होंने दाखिले के समय बेहत प्रशंसनीय प्रदर्शन किया था ! कुछ ने पढाई छोड़ दी, कुछ ने समझौता किया, कुछ ने घुट घुट के उस परिसर से अपने डिग्री को पूरा किया और बहुत से उन छात्रों ने टूट कर संस्थागत हत्या शिकार होते हुए दुनिया छोड़ना उचित समझा !

इंटरनेट की दुनिया से मैंने कुछ आंकड़े निकाले, जिसमे कुछेक  विश्विद्यालयों के पिछले दस सालो के कुछ बड़े आंकड़े एकत्रित किये जो  ऐसी सोच वाली व्यवस्था के कारण संस्थागत हत्या के शिकार हुए,

M. Shrikant, B.Tech, IIT Bombay,

Ajay S. Chandra,PhD,IISc,

Jaspreet Singh, MBBS, GMC Chandigarh,

Senthil Kumar, PhD, School of Physics,HcU
Prashant Kureel, B.Tech, IIT Kanpur ,

G. Suman, IIT Kanpur,

Ankita Veghda,BSc Nursing, Ahmedabad ,

D Syam Kumar, B.Tech, Vijayawada ,

S. Amravathi, national level young woman boxer, Centre of Excellence, Sports Authority of Andhra Pradesh,Hyderabad,

Bandi Anusha, B.Com, Hyderabad,

Pushpanjali Poorty, MBA,Bangalore

Sushil Kumar Chaudhary, MBBS,KGMC, Lucknow
Balmukund Bharti, MBBS, AIIMS-D

JK Ramesh, BSc Bangalore,

Madhuri Sale, , IIT Kanpur

G. Varalakshmi, B.Tech Hyderabad

Manish Kumar,B.Tech, IIT Roorkee

Linesh Mohan Gawle, PhD, National Institute of Immunology, New Delhi , 16 April

Aniket Ambhore,B.Tech,IIT BOMBAY

Anil Kumar Meena, AIIMS-D

Bal Mukund, AIIMS-D

Rejani. S. Anand, IHRDE

Rohith Vemula,PhD, HcU

Ashwani Kumar, MBBS, JHANSI

हालांकि भारत में समाज सहित  विश्विद्यालयों को देखे तो प्रति घंटे एक युवा को मजबूरी वश ऐसे कदम उठाने पड़ जाते हैं पर विश्विद्यालयों में होने वाले ऐसे घटना क्रम समाज के बुद्ध जीवियो समेत तमाम लोगो को झकझोर के रख देते और सवाल पूछने पर मजबूर कर देते क्या यही लोकतंत्र का सपना हमारे पूर्वजो  ने देखा था, जब हम अपने समाज के सबसे मुख्य नींव विश्विद्यालय को जातिगत मानसिकता से ग्रसित हो सम्पूर्ण रूप से लोकतान्त्रिक नहीं बना पा रहे तो हम कैसे अपने पूर्वजो का सपना पूरा कर रहे रहे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई और लोकतंत्र की स्थापना तक अपना खून पसीना एक किया हुआ था ! विश्विद्यालय परिसर का अलोकतांत्रिक हो जाना विश्विद्यालयों के साथ समाज राष्ट्र हर किसी के लिए हानिकारक होगा !

विश्विद्यालयों में घटित तमाम घटनाओ के आंकलन बाद हम आसानी से कह सकते विश्विद्यालय पूर्णतः  लोकतान्त्रिक नहीं और मेरे जान से प्यारे लोकतंत्र विश्विद्यालयों में सब ठीक नहीं है

अंत में लोकतंत्र  को और मजबूत बनाने के वादे के साथ आप सभी पाठको को गणतंत्र दिवश की बधाई !

Author: Satyendra Satyarthi ( PhD Scholar, Indian Institute of Technology and Social Activist), Dr Ambedkar National Award Winner-2016

Read -  The Myth of Unity in Diversity

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