डाॅ. बाबासाहब अंबेडकर और धर्मांतरण


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13 अक्तूबर 1935 को बाबासाहब अंबेडकर जी ने नाशिक जिला के येवला शहर में धर्मांतरण की घोषणा की।

बाबासाहब अंबेडकर यह धर्मांतरण न करे या अपने धर्म में आ जाए इसलिए कुछ व्यक्ति एवं कुछ धर्मों के लोग उन्हें लालच दे रहे थे।

1) 24 अक्तूबर 1935 को ‘ डुबकी’ के लिंगायत समाज के लोगों ने डाॅ.अंबेडकर को तार भेजकर सुचित किया की “लिंगायत धर्म के तत्व समझकर यदि उस धर्म को ग्रहण करने की आपकी इच्छा हो, तो हम आपको लिंगायत धर्म में समाविष्ट करने के लिए तयार हैं।”

2) डाॅ.अंबेडकर को समधी बनाने की तयारी :-

अहमदाबाद के स्थानीय आर्य समाज के सेक्रेटरी पं.श्रुतबंधुशास्त्री ने डाॅ.अंबेडकर को पत्र लिखकर आर्य समाज में शामिल होने की बिनती की। पं.शास्त्री ने कहाँ की वे ब्राह्मण होने के बावजूद भी डाॅ.अंबेडकर के पुत्र के साथ अपनी बेटी का विवाह करने के लिए तयार हैं और आर्य समाज के लोग भी इसपर अपनी सहमती दर्शाएंगे।

3) डाॅ.अंबेडकर को अपने धर्म में लाने के लिए ईसाइयों का प्रयास :-

ख्रिश्चन धर्मप्रसारकों ने अछूतों को अपने धर्म में कर लेने के लिए विपुल धन खर्च करना पड़ेगा, इस बात को ध्यान में रखकर भारत, अमेरिका और इंग्लैंड से धनराशि इकठ्ठा करने का काम शुरू किया। लंदन में मि.गाॅडफ्रे नामक धर्मप्रचारक ने हजारों पौंड जमा किए। अपने प्रचार के लिए उसने ‘ The Untouchables Quest ‘ इस शिर्षक से जुलै 1936 में एक पुस्तक प्रकाशन भी किया।

ईसाइयों की ओर से कई धार्मिक नेतागन राजगृह बंबई में बाबासाहब अंबेडकर जी से मिले। उन्होंने बाबासाहब से निवेदन किया अगर वे सभी अछूतों के साथ ईसाई धर्म स्वीकार करे तो शहरों, तहसीलों, टाउनो और गावों में शिक्षा संस्थाओं के जाल बिछा देंगे। कोई भी नवधर्मांतरित ईसाई अशिक्षित नहीं रहेगा। सबकी मुफ्त शिक्षा व्यवस्था केंद्रीय चर्च की ओर से की जाएगी। इसके अलावा कई करोड़ रूपये उनको स्वेच्छा मनचाही उपयुक्त मदद में व्यय करने को दिया जाएगा।

4) डाॅ.अंबेडकर को अपने धर्म में लाने के लिए मुसलमानों का प्रयास :-

अक्तूबर 1935 मे काॅलिफेट सेंट्रल कमेटी (खिलाफत केंद्रिय समिति) के प्रतिनिधि मौलाना मुहम्मद इरफान ने डाॅ.अंबेडकर से भेंट की और यह आश्वासन दिया की इस्लाम में पुर्ण समानता हैं और यह भी की इस धर्मांतरण से उन्हें भारत के आठ करोड़ मुसलमानों का नेता बनने की संभावना होगी। उसी महिने में इंडियन एसोसिएशन ऑफ उलेमा के संयोजक मौलाना अहमद सईद ने अंबेडकर को तार भेजा, “मैं आपको तहे दिल से इस कुदरती मजहब में आने की दावत देता हूँ, सिर्फ़ इसी में आपकी उम्मीदें पुरी होंगी।”

इस्लाम के मानने वालों ने लिखा की उनका धर्म एक खुदा और समतामय भाईचारे पर आधारित हैं। इसमें छुआछूत और असमानता नहीं हैं। अगर अछूत सभी मुसलमान हो जाएं तो, हर गाँव और मोहल्लों में मस्जिद और मक्तव (शिक्षा के स्कूल) होंगे। इस्लामी काॅलेज और स्कूलों में उनके बच्चे भली-भांति पढ़-लिखकर होशियार बनेंगे। यहाँ तक की निजाम हैदराबाद का राजदूत, स्वयं निजाम साहब का पत्र (खत) लेकर डाॅ.अंबेडकर के पास आया। निजाम ने यह लिखते हुए की हमारे लोग जितने भी इस्लाम धर्म अपनाएँगे, डाॅ.अंबेडकर को प्रतिव्यक्ति के हिसाब से लाखों-करोड़ों रूपये भेंट किए जाएंगे। दुसरी सुविधाएँ अलग से दी जाएगी। डाॅ.अंबेडकर को उनसे मिलने के लिए निमंत्रित किया था।

हैदराबाद रियासत के निजाम की प्रेरणा से कुछ मुस्लिम धर्म के जाल में फसांने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने एक दिन डाॅ.अंबेडकर डाॅ.अंबेडकर से मिलने का प्रयास किया, डाॅ.अंबेडकर को जैसे ही पता चला सारा दिन वे शहर में मोटर से घुमते रहे। आखिर में डाॅ.अंबेडकर उनको झांसा देकर महाड के नजदिक साव नामक एक गर्म झरने के गाँव गए। फिर भी एक बार बाबासाहब डाॅ. अंबेडकर को बंबई के अंजूमन इस्माईल हायस्कुल नामक इस्लामी स्कूल में संपन्न एक समारोह में उपस्थित होना ही पड़ा। वहाँ वे एक शब्द भी नहीं बोले। मेरे गले में दर्द हैं ऐसा उन्होंने बहाना बनाया मगर मुसलमानों के मीठे-मीठे भाषण उन्होंने सुने थे।

कन्हैयालाल गौबा नामक विधानसभा के एक मुसलमान सदस्य ने डाॅ.अंबेडकर को इस आशय का तार प्रेषित किया की अगर अछूत समाज को राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्रों में समान स्थान और समान अधिकार देने के लिए मुसलमान तयार हैं और उनके स्वागत के लिए भारतीय मुसलमान तत्पर हैं। उन्होंने डाॅ.अंबेडकर को मुसलमान प्रतिनिधि के साथ प्रत्यक्ष चर्चा करनी हैं, तो वे बदायूं मे आयोजित होनेवाली परिषद मे तुरंत आएं।

5) डाॅ.अंबेडकर को अपने धर्म में लाने के लिए सिखों का प्रयास :-

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सिखों ने भी अन्य धर्मावलंबियों की तरह प्रलोभन (लालच) दिए थे। तत्कालीन महाराज पटियाला ने, उनको (बाबासाहब) अपने राज्य का प्रधानमंत्री बनाने के संबंध में लिखा था, यदि वे अपने समाज भाईयों के साथ सिख धर्म को अंगिकार (स्विकार) ले तो वो उनको (बाबासाहब को) अपने राज्य का प्रधानमंत्री बना देंगे।

अमृतसर के स्वर्णमंदिर संस्था के उपाध्यक्ष सरदार दलीप सिंह दोआबिया ने अपने 16 अक्तूबर 1935 के तार में बाबासाहब से कहाँ की, अछूतों के लिए आवश्यक सभी बातें सिख धर्म दे सकता हैं। सिख धर्म एकेश्वरी हैं। सभी के साथ ममता और समता से बर्ताव करनेवाला हैं।

पटियाला के महाराज भूपिंद्र सिंह ने अपनी बहन की शादी डाॅ.अंबेडकर से करने की पेशकश की, ताकि सिख धर्म में दिक्षित होने पर उनका मान-सम्मान बढ़ सकें। इसी साथ उन्होंने यह भी कहाँ की अगर वे सिख हो जाए, तो उनको पटियाला राज्य के प्रधानमंत्री बनाएँगे।

(संदर्भ :-

किताब:- बाबासाहब डाॅ. अंबेडकर की धम्मक्रांति

लेखकद्वय:- डाॅ.प्रदिप आगलावे और डाॅ.संजय गजभिए)

6) जब बाबासाहब डाॅ.अंबेडकर जी ने हिन्दू धर्म छोड़ने की घोषणा की थी तब बॅरि. जिना ने बाबासाहब को मुसलमान धर्म अपनाने की सलाह दी थी। बाबासाहब ने कहाँ था की हम इसपर विचार करेंगे (सोचेंगे)

जीनाने उस समय कराची में एक सभा के दौरान एक वक्तव्य (घोषणा) की, ” लढ लढ के लिया पाकिस्तान और हस हस के लेनेवाले हैं हिन्दुस्तान।” यह घोषणा गांधी के कानोंपर गई। और गांधी ने डाॅ.अंबेडकर को बुलाकर यह कहाँ की, आप किसी भी परिस्थिति में मुसलमान धर्म न स्विकारें। तब बाबासाहब ने गांधी से कहाँ की, मेरे समाज के उन्नती के लिए वह बड़ी ऑफर हैं और शायद हमें प्रधानमंत्री पद भी मिल सकता हैं। गांधी थोड़ा हताश होकर बोले, “हाँ वैसा भी हो सकता हैं, किन्तु भारत यह देश रह सकता हैं तो केवल आप की वजह से।” बाबासाहब ने जिना की ऑफर छोड़ दी।

(संदर्भ:-

किताब :- जागतिक विद्वानांच्या दृष्टीत डाॅ.बाबासाहेब आंबेडकर

संपादक:- भालचंद्र लोखंडे)

डाॅ.बाबासाहब अंबेडकर को धर्म परिवर्तन के बारे में ऐसे बड़े बड़े ऑफर आए । अगर वो उन ऑफर को स्विकारते तो वे आज दुनिया के सबसे अमिर आदमी बन जाते। किन्तु बाबासाहब ने ऐसा नहीं किया। बाबासाहब अपने समाज के लोगों को इज्जत से जिनेवाला धर्म देना चाहते थे। जिसमें भाईचारा, स्वातंत्र्य, समानता हो।

बाबासाहब अंबेडकर जी ने अनेको धर्मों का अध्ययन कर के यह पाया की बौद्ध धम्म ही अपने लोगों के हित में हैं। इसी धम्म में स्वातंत्र्य, समानता और भाईचारा हैं।

बाबासाहब अंबेडकर और माईसाहब (सविता) अंबेडकर इन्होंने 14 अक्तूबर 1956 को नाग लोगों के नागपूर में भदन्त चंद्रमणी द्वारा बौध्द धम्म की दिक्षा ली और बाबासाहब अंबेडकर जी ने खुद अपने हाथों से अपने लाखों अनुयायियों को बुद्ध धम्म की दिक्षा दी।

(महत्वपूर्ण जानकारी :-

1) प्रथम विश्व बौद्ध भातृत्व सम्मेलन, कोलंबो जाने से पुर्व बाबासाहब ने माई जी के साथ तथा 101 समता सैनिक दल के सैनिकों के साथ 2 मई, 1950 को दिल्ली में रीडिंग रोड बुद्ध विहार पर भंते आर्यवंश और भिक्खु डाॅ. सध्दातिस्स से बौध्द धम्म की दीक्षा ग्रहण कर ली थी। -बौद्धाचार्य शांतिस्वरूप बौद्ध

2) 16 अक्तूबर 1956 की रात में चन्द्रपूर (महाराष्ट्र) में अढाई लाख लाख अनुयायियों ने डाॅ.अंबेडकर के हाथों से बुद्ध धम्म की दिक्षा ली।

3) 6 दिसम्बर 1956 को बाबासाहब अंबेडकर जी का महापरिनिर्वाण हुआ। 7 दिसम्बर 1956 को बाबासाहब अंबेडकर जी के लाखों अनुयायियों ने बाबासाहब अंबेडकर जी के पार्थिव शरीर की उपस्थिति में बौद्ध धम्म की दिक्षा ली।)

बाबासाहब ने हमारे समाज को किचड से निकालने के लिए बहोत मेहनत की। उन्होंने बहोत से बड़े बड़े ऑफर को नकारा। अगर वे हमारे समाज के उन्नती के लिए बड़े बड़े ऑफर नकार सकते हैं तो हम उसी बाप की औलाद होने के नाते हम भी अपने विरोधियों के ऑफर नकार सकते हैं। नकार सकते हैं नहीं बल्कि नकारना ही चाहिएं। बाबासाहब अंबेडकर और उनके विचारों को बेचने से पहले हम सबके बाप डाॅ.बाबासाहब अंबेडकर जी के त्याग और बलिदान के बारे में एकबार जरूर सोचना।

सूचना :- उपर के 5 मुद्दे बाबासाहब डाॅ.अंबेडकर की धम्मक्रांति (लेखक:- डाॅ.प्रदिप आगलावे , डाॅ.संजय गजभिए) इस किताब से जैसे के वैसे लिए गए हैं और छठा मुद्दा जागतिक विद्वानांच्या दृष्टीत डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर (संपादक:- भालचंद्र लोखंडे) इस किताब से लिया गया हैं।

आभार Amit Indurkar जी

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