प्रसव वेदना – एक कहानी


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चमारों का गांव ना सड़क ना कोई मरघट। गांव से शहर की तरफ जाने वाली सड़क तक पहुँचने के बीच तकरीबन ढेड़ किलोमीटर खेतों की पगडंडियों से गुजरकर जाना पड़ता था।

श्रावण का महीना था, बरसात हो रखी थी कि फुलुआ की घरवाली को प्रसव-वेदना शुरु हो गई। सड़क तो थी नहीं, बरसात में मिट्टी का भी ये हाल था कि पैर रखते ही चप्पल-पन्हैया दो-ढाई सेर की तुरंत हो जावे। चिपकनी और रपटनी जो थी।

पर घरवाली की पीड़ा देख बेबस फुलुआ करता भी क्या, उसने गांव के लोगों को आवाज लगाई-

‘अरे संजुआ ओ भोंपा ओ रे चंदुआ’

‘का है गयो काहे चिल्ला रहो है?’

‘अरे वो सुखिया के पेट में पीर है रही है अस्पताल ले जाने है’

‘पर रस्ता तो खराब है साइकिल भी न निकल पावेगी…मडगार्ड में माटी भर जावेगी’

‘हाँ…तभी तो तू को बुलाये सुखिया की हालत बहुतई खराब है रही है खटिया पे ले जानी पड़ेगी’

‘चलो तो फिर जल्दी करो पानी भी तनिक थम गयो है अभी, तबतक ले चलो’

चारो लोग सुखिया को चारपाई पर लिटा लेते हैं और अपने-अपने कंधे पर उठा लेते हैं मानो अर्थी को कंधा दे रहे हों। रास्ता इतना जटिल हो गया था बरसात की वजह से कि सड़क तक पहुँचने में ही ढेड़ घंटा लग गया। सुखिया की हालत भी लगातार बिगड़ती जा रही थी। सड़क के किनारे एक ठाकुर का घर था तो फुलुआ बोला-

‘ओये संजुआ चल ठाकुर के यहाँ चलके पूछत हैं होये सकत है वो हमपे रहम खाके अपनी जीप से अस्पताल पहुँचा दे’

‘अरे फुलुआ जे ठाकुर हैं हम चमरन की परछाई तक से तो नफरत होत है तुम कहत हो जे गाड़ी से छुड़वाये देंगे’

‘तो पूछ के देख लेत हैं नहीं तो अपन खटिया पे लादकर तो चल ही रहे हैं’

‘चल तेरी इत्ती ही इच्छा है बेइज्जती करवायवे की तो चल पूछ ही लेत हैं’

फुलुआ और उसके साथी ठाकुर के घर के बाहर पहुँचकर आवाज लगाते हैं-

‘ठाकुर साब ओ ठाकुर साब!’

‘अरे को है काहे नर्राखेंच मचायें है’

‘अरे ठाकुर साब हम गांव के फूलाराम’

‘हाँ तो का करें…का चैयै का काम है बोल और जे खटिया पे कौने लादे है बे’

‘अरे ठाकुर साब का बतायें हमार घरवाली की हालत बहुतई खराब है टैम से अस्पताल न पहुँची तो कछु भी होये सकत है’

‘का है गयो है तेरी लुगाई को?’

‘ठाकुर साब वो पेट से है…आप हमें अपनी गाड़ी से अस्पताल तक पहुँचाये देओ तो बहोत किरपा होयेगी’

‘तो़ेये और तेरी लुगाई को गाड़ी पे छुड़वाये दें, तुम चमरन की इत्ती औकात है गई कि ठाकुरन की गाड़ी पे जावोगे…चल कौनो गाड़ी बाडी़ न है। आये जात हैं मुंह उठाये के कि गाड़ी पे छुड़वाये देओ बहुत बड़े लाटसाब हो नहीं’

फुलुआ समझ गया ये निर्दयी ठाकुर कोई मदद नहीं करेगा ना ही अब इसके आगे गिड़गिड़ाने से कोई हल नहीं निकलेगा तो वो अपने साथियों के साथ चारपाई को कंधे पर लादकर जैसे गांव से निकला था वैसे ही चल देता है।

थोड़ी दूर ही निकला था कि सुखिया का दर्द की वजह से कराहने की आवाज सुनाई देनी बंद हो गई। फुलुआ आवाज लगाता है…

‘सुखिया ओ री सुखिया, अरे बोलत काहे नहीं, कछु तो बोल’

जब जवाब नहीं मिला तो,

सभी ने चारपाई नीचे उतारी तो देखा सुखिया अपना दम तोड़ चुकी थी, बच्चा भी पेट में ही मर चुका था। फुलुआ जोर-जोर से रोने लगा, छाती पीटने लगा। साथी-संगी कैसे भी समझा-बुझाकर वापस गांव ले गऐ। गांववासियों ने रोता हुआ देखा तो सब इकठ्ठे होने लगे। गांव की औरतों में भी रोबाराहट मच गया।

‘अरे फुलुआ चुप हो जा, भगवान की शायद जही मर्जी थी, चुप हो जा फुलुआ’…इस तरह कुछ लोग फुलुआ को भी ढांढस बंधाने में लगे थे।

फुलुआ बेचारा रोते-रोते बस यही बात दोहरा रहा था कि

“गांव के लिये सड़क होती या ठाकुर मदद कर देता तो हमारी घरवाली ना मरती”

लेखक – सत्येंद्र सिंह

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