डॉ. अम्बेडकर का मूल चिंतन है स्त्री चिंतन


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भी तक दलित महिला आन्दोलन गैर दलित महिला आन्दोलन से जुड़ने व उनके साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखता था। पर गैर दलित महिला आन्दोलन की सवर्ण मानसिकता से ग्रसित स्त्री नेता दलित महिलाओं से भेदभाव करती थी। यह भेदभाव तब और स्पष्ट रूप से उभर कर आया जब 1937 में दिसम्बर में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद’ के अधिवेशन में हिन्दू महिलाओं ने दलित समाज की प्रसिद्ध लेखिका व दलित महिला नेता जाईबाई चौधरी को भोजन की जगह से दूर बिठा कर उनकी बेइज्जती की। उनके इस भेदभाव पूर्ण व्यवहार से क्षुब्ध होकर 1 जनवरी 1938 को नागपुर के धरम पेठ में दलित महिलाओं ने बड़ी भारी सभा की जिसमें हजारों-हजार दलित महिलाओं ने भाग लिया।

सवर्ण महिलाओं द्वारा बरती गई दलित महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण बर्ताव व छुआछूत और भेदभाव का कड़ा  विरोध किया गया। दलित नेत्री अंजनी बाई भ्रतार और सखूबाई ने इन हिन्दू महिलाओं को ‘बेशरम’ और ‘नीच किस्म का आचरण करने वाली’ कहकर कड़े शब्दों में उनकी भर्त्सना कर अपना रौष प्रकट किया’ और दलित महिलाओं को स्वाभिमानपूर्ण स्वाबलम्बी होकर जीने की शिक्षा दी।’ इसी परिषद में रमाबाई अम्बेडकर महिला संघ स्थापित किया गया। इस महिला मंडल ने दलित महिलाओं के लिए रात्रि स्कूल शुरू करने का फैसला लिया। (आम्ही इतिहास घड़वला- उर्मिला पवार, मिनाक्षी मून)

20 जुलाई 1942 को आयोजित अखिल भारतीय दलित महिला सम्मेलन में 25 हजार महिलाओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन में स्वयं डॉ. अम्बेडकर उपस्थित थे। इस सम्मेलन की विशेष बात यह थी कि इस सम्मेलन में पूरे भारतवर्ष से आई दलित महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता सुलोचना डोगरे ने की और सभा की मुख्य सचिव इन्दिरा पाटिल तथा स्वागताध्यक्ष कीर्ति पाटिल थी। 1942 में ही अखिल भारतीय दलित महिला फेडरेशन ने दलित महिला स्त्रियों की राजनैतिक व सामाजिक स्थिति पर अधिवेशन रखा जिसमें फेडरेशन की सेकेर्टी इन्दिरा पाटिल ने समाज में दलित महिलाओं की शोचनीय स्थिति पर प्रकाश डालते हुए अपने जोशीले भाषण में कहा ‘अपने पुरूष साथियों द्वारा अधिकारों की लड़ाई में हमें पीछे नही रहना है। हमें उनके साथ रहना है। सामान्यत घर के कामकाज महिलाओं के हिस्से में आते है, पर हमें उससे नही चिपटे रहना चाहिए। पुरूषों जैसी ही स्वतन्त्रता पाने के लिए हम भी बैचेन है और वह हमारा अधिकार है। इस अधिकार को हम आन्दोलन और अपने प्रयास से ही पा सकते हैं। जो दुखों से पीड़ित है उन्हें ही स्वतन्त्रता की जरूरत है। हमारी दलित महिलाओं में साक्षरता की दर बहुत कम है। उनकी शिक्षा के प्रति लगन जागृत करना हमारा कर्तव्य है। साथ ही हम अपनी अनपढ़, अनाड़ी बहनों की मदद से अस्पृश्यों के हक के लिए हमारे नेता बाबा साहब अम्बेडकर के नेतृत्व में हम समय आने पर प्राणों का बलिदान देकर लड़ाई के लिए तैयार रहेंगी। हमें अपना पिछड़ापन नष्ट करने के लिए संगठित होकर कार्य करने हैं। इन कार्यो को करने के लिए मैं एक केन्द्रीय संस्था व उसके सभी प्रांतों में शाखा खोलने का प्रस्ताव रखती हूँ। जनरल सेक्रेटरी इन्दिरा पाटिल ने दलित महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। महिलाओं के शोचनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार हिन्दू धर्म की भर्त्सना करते हुए कहा ‘हिन्दू धर्म के पालन की वजह से ही हम पतियों के सामने सिर झुकाना, घर और बच्चों की देखभाल करने को ही हम अपना काम समझते हैं। हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण कार्य है अपनी बहनों के दिमाग से हिन्दू धर्म की गुलामी भरी सोच को निकाल देना। ’इसी सभा में सुलोचना डोगरे ने कहा कि ’हम बाबा साहब के साथ अस्पृश्यता के राक्षस को नष्ट कर देगें।‘ (आम्ही इतिहास घड़वला- उर्मिला पवार, मिनाक्षी मून)

इस परिषद ने कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये गये जो दलित महिलाओं की स्थितियों में सुधार लाने की दृष्टि से अनमोल थे। पति-पत्नी का तलाक देने का अधिकर होने का कानून सरकार से बनवाना, एक से ज्यादा पत्नियां यानि बहु-पत्निवाद का विरोध, कोयला खान में व अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली मजदूर, किसान, महिलाओं के लिए 21 दिन की छुट्टी, चोट आने पर मुआवजा, 20 साल की नौकरी होने पर कम से कम हर एक महिला को 15 रूपये मासिक पेन्शन देने की योजना, स्वास्थ्य मनोरंजन के साधन तथा काम के घंटे निश्चित कर कामगार महिलाओं के हित में प्रस्ताव पारित किए गए। जिला तालुका लोकल बोर्ड व विधायका में दलित महिलाओं के रिर्जेवेशन की बात भी इस सभा में जोर शोर से उठाई गई। दलित महिलाओं व उनकी नेताओं द्वारा निडरता से रखे गए विचार व उनकी बौद्धिक दृष्टि देख बाबा साहब अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस में दलित महिलाओं का अपार जन समूह और उनका स्वतन्त्रता पूर्वक विचार-विमर्श देख बाबा साहब ने दलित महिलाओं की प्रशंसा करते हुए कहा ‘महिलाओं में जागृति आई तो वह अस्पृश्य समाज के लिए बड़ी क्रांति हो सकती है। महिलाओं की संगठित संस्था हो इस पर मेरा अटूट विश्वास है। सामाजिक कुरीतियां नष्ट करने में महिलाओं का बड़ा योगदान हो सकता है। मैं अपने अनुभव से यह बता रहा हूं कि जब मैने दलित समाज का काम अपने हाथों में लिया था तभी मैने यह निश्चय किया था कि पुरूषों के साथ महिलाओं को भी आगे ले जाना चाहिए। इसलिए ही अपनी परिषद के साथ-साथ ही महिला परिषद भी ली जाती है। महिला समाज ने कितनी मात्रा में प्रगति की है इसे मैं दलित समाज की प्रगति में गिनती करता हूँ। इस परिषद में महिलाओं की बड़ी भारी संख्या में शामिल होने की स्थिति देखकर मुझे तसल्ली हुई है व खुशी भी हो रही है कि हमने प्रगति की है। ( हमने भी इतिहास गड़ा है। पेज-78उद्धृत)

इसी सभा में डॉ. अम्बेडकर ने दलित महिलाओं से अपनी बच्चियों की शादी कम उम्र में ना करने की अपील करते हुए उनको शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़ा होने पर बल दिया तथा कम बच्चे पैदा करने व साफ सफाई से रहने का सन्देश देते हुए महिलाओं का परिवारों में समानता का स्तर हो इस पर भी बात की। उन्होने महिलाओं में स्वाभिमान जगाते हुए कहा कि आप घर में पति की दासी बनकर नही पति की दोस्त बनकर बराबरी के रिश्ते से जिये। नागपुर में 1942 में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की स्थापना होने के बाद नासिक में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरोशन की मीटिंग में शान्ता बाई दाणी को पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया गया। 1944 में भी कानपुर में दलित फेडरेशन के दूसरे अधिवेशन में भी महिलाओं ने अपना स्वतन्त्र अधिवेशन किया तथा नागपुर जैसे ही प्रस्ताव पारित किए गए। इसकी अध्यक्षता कु. शान्ता बाई दाणी ने की। इस अधिवेशन में बाबा साहब ने भाग लेते हुए कहा ‘‘आप आगे बढ़ें, आपके जीवन में सुनहरी सुबह का पदार्पण हुआ है। 6 मई 1945 में तीसरा अखिल भारतीय अस्पृश्य महिला परिषद का अधिवेशन मुबंई में आयोजित किया गया। जिसमें हजारों दलित महिलाओं ने भाग लिया। सभा की अध्यक्षता तत्कालीन मद्रास प्रान्त की प्रमुख कार्यकर्ता मीनांबल शिवराम ने की। इस सभा के मुख्य वक्ता शांता बाई दाणी सरोजिनी जाधव, मुक्ता सर्वगौड़, हैदराबाद की सौ. राजमणि मुंबई की गोदावरी रोकड़ आदि ने स्त्री-पुरूष विषमता पर तीखे विचार रखे। उन्होने कहा कि पुरूष विषमता की शिकार महिला को अपनी मुक्ति के लिए किस तरह के कदम उठाने चाहिए उन्होनें इसका मार्ग दर्शन किया। परिषद की अध्यक्षीय भाषण में सरोजिनी जाधव ने कहा कि ‘अस्पृश्य स्त्री सर्व दृष्टि से परतन्त्र है। अगर उसे स्वतन्त्रता प्राप्त करनी है तो अस्पृश्य महिलाओं का आन्दोलन निर्माण होना चाहिए।’ मिनाबंल शिवाराम ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि ‘अस्पृश्य स्त्री विधवा विवाह, घटस्फोट इन प्रथाओं से मुक्त होते हुए भी केवल हिन्दू धर्म के कायदा कानून उस पर लदे होने के कारण उसकी स्थिति दुखद हो गई है। दलित महिला को हिन्दू धर्म का त्याग करना चाहिए। दलित महिलाओं को घूघंट निकालना छोड़कर निर्भय होकर आत्मविश्वास से जीना चाहिए। ‘दलित आत्मकथन लिखने वाली मुक्ता सर्वगौड ने ‘स्त्री-पुरूष समान है और दोनो की जिम्मेदारी भी बराबर की है’ ऐसा भाषण देकर अपने क्रांतिकारी विचार प्रकट किए। (आम्ही इतिहास छड़विलाद्ध)

पुणे 29 मई 1956 को महाराष्टीय चमार ढोर परिषद हुई। इस अधिवेशन में भी सेवा सदन की श्रीमती सावित्री बाई बोराडै व गुणाबाई वाघमारे दोनो ने ही भाषण दिया। इस भाषण में सावित्री बाई बोराड़े ने कहा ‘लड़कों से ज्यादा लडकियों की शिक्षा की जरूरत है। भावी पीढ़ी के अनर्थ टालने के लिए स्त्री शिक्षा की जरूरत है। बच्चों की शिक्षा केवल माताओं पर निर्भर करती है। हमें दूसरों पर निर्भर होने की याचक वृति को खत्म करना चाहिए। सफाई, अच्छी सेहत, शुश्रुषा इन सबके लिए शिक्षा की जरूरत है। इसके बाद गुणाबाई बाघमारे ने कहा महिलाओं को पढ़ना चाहिए। महिला पढ़ी-लिखी होगी तो बच्चों पर अच्छे संस्कार डालेगी। अपने आगे भावी पीढ़ी को शिक्षा के माध्यम से होशियार और संस्कारी बनाऐगी। इसलिए महिलाओं को शिक्षित होना जरूरी है।

पृथक प्रतिनिधित्व, पृथक चुनाव क्षेत्र के लिए किया गया समझौता पूना करार कहलाता हैं। उस पूना समझौते के तहत सरकार व गांधी द्वारा दलित समाज को किए गए सारे वादे झूठे निकले। इसलिए अखिल भारतीय दलित फेडरेशन की तरफ से भारतीय विधान मंडल के सामने सत्याग्रह करने का फैसला किया गया। इस सत्याग्रह में बम्बई, पूना, कानपुर उत्तर प्रदेश से हजारों दलितों ने भाग लिया। इस सत्याग्रह में सीताबाई, गीताबाई गायकवाड आदि दलित नेत्रियों ने अपनी महत्पूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध दलित नेता भाउराव गायकवाड के भाई काशीनाथ गायकवाड को भाउराव समझकर ‘अहिंसक’ गांधीवादियों ने उनकी खूब पिटाई की गई, जिसमें उनका एक कान भी टूट गया। दलित दमन के इस रूप को देख दलित सत्याग्राहियों ने जेल भरों आन्दोलन शुरू कर दिया। इस जेल भरो आन्दोलन में अनेक दलित महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ जेल में भूखी-प्यासी बन्द रही। एक बड़ी रोचक घटना है जब सत्याग्राही जेल भरने के लिए जूलुस के रूप में नारे लगाते जा रहे तब दलित कार्यकर्ता बराड़े की डेढ़ वर्षीया बच्ची भी नारे लगा रही थी। चलो पुकारों जय भीम के कहने पर वह ‘चलो कपारों’ बोलती थी। उसकी ‘चलों कपारों’’ सुनकर लोगों में खुशी और उत्साह की लहर दौड़ जाती थी। मनोरमा बाई, तुलसीराम धोत्रे, काशीबाई जैतापकर आदि दलित कार्यकर्ता सत्याग्रह में शामिल होकर जेल गए। मनोरमा बाई तो 15 दिन जेल में रही। श्रीमती वराड़ै अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ जेल में कैद थी। न्यायधीश उसके छोटे बच्चों पर दया दिखाते हुए बोला ‘‘बहिन जी आपका बच्चा बहुत छोटा है अपना आप गुनाह कबूल कर मांफी मांग कर घर जाईये’ इस पर श्रीमती वरालै ने जज से कहा ‘जिस दिन हमने घर छोड़ा था, पूरी तरह सोच-समझ कर छोड़ा था। फिर भी हम पीछे हटने वाले नहीं है। मैनें गुनाह किया है तो मुझे सजा दीजिए। जेल से छूटने के बाद निर्भीक, बहादुर श्रीमती वोराडे का बहुत ही लम्बा और विचारोत्तेज का साक्षात्कार ‘जनता पत्र’ में छपा था’। (आम्ही इतिहास घड़वला पेज 82-83)

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इस प्रकार दलित महिला आन्दोलन आरम्भ में स्वागत गीत के माध्यम से ज्ञान शिक्षा के प्रयास द्वारा, मन्दिर प्रवेश, पानी, समान वेतन, अस्पृश्यता विधायका में अधिकार, पुरूषों की गुलामी से मुक्ति,  आदि मुद्दों को प्रतीक बनाकर डॉ. अम्बेडकर का हाथ थाम धीरे-धीरे समानता, अस्पृश्यता व गरीबी तीनो स्तर पर शोषण से संघर्ष कर अपनी वैचारिक समझ बनाता हुआ मुक्ति की राह पर चलकर दलित आन्दोलन का प्राण व अन्य आन्दोलनों का प्रेरणा स्त्रोत बन गया। आजादी, अस्मिता संघर्ष, के उबड़-खाबड़ संघर्ष भरे रास्ते से गुजरता हुआ दलित महिला आन्दोलन दलित नारीवाद की सीमा में प्रवेश कर गया। भारत में जगह-जगह चलें इस आन्दोलन में हजारों की संख्या में दलित महिलाएं जुड़ी जेल गई, रात-दिन धरनो पर भूखी प्यासी बैठी और हिम्मत, बहादुरी, धैर्य, लगन से अपनी मांग पूरी करने के लिए संघर्षशील रहीं। दलित महिला आन्दोलन अस्पृश्यता, लिंगीय भेदभाव, असमानता के किले को ध्वस्त करने के लिए शिक्षा के हथियार को धार देता रहा अनेक दलित नेत्रियां दलित समाज के लिए स्कूल, कॉलेज, हॉस्टल खोलने के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगी व उनका संपादन व प्रकाशन भी करने लगी। कई दलित नेत्रियां सामाजिक कार्य के साथ-साथ लेखन के क्षेत्र में बढ़ते हुए प्रसिद्ध लेखिकाओं के रूप में स्थापित हुई। अम्बेडकार कालीन दलित महिला आन्दोलन में सैकड़ों दलित महिलाएं निकल कर आईं, जिन्होने दलित मुक्ति के संघर्ष की कमान अपने हाथों में संभाल ली। रमाबाई अम्बेडकर, तुलसी-बनसौडे, गीताबाई गायकवाड, अंजनी बाई देश भ्रतार, शान्ता बाई दाणी, जाईबाई चौधरी, सीता बाई गायकवाड, इन्दिरा पाटिल, कीर्ति पाटिल, सुलोचना डोगरे, राधा बाई, लक्ष्मी नायक, सुराबाई मोहिते, वेणुबाई भटकर, रंगबाई शुभकर, तानुबाई कांबले, राधा बाई वरालै, मिटलेली कवाड़े, कौशल्या बैसन्त्री, बेबी ताई काम्बले, मीनाबल शिवराम, शांता बाई सरौदे और ना जाने कितनी अनाम, अज्ञात दलित औरतें जो इतिहास की गर्त में छिप गईं इन सभी ने घर-परिवार, फैक्टियों, खेतों-खदानों से निकलकर दलित महिला मुक्ति का परचम चंहु दिशा में फहराया।

हिन्दू कोड बिल क्यों?

डॉ. अम्बेडकर भारतीय स्त्री खासकर, हिन्दू स्त्री जिसमें सवर्ण तथा दलित दोनों की समाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते थे। उनकी दशा सुधारने के लिए वो एक ऐसा कानून बनाना चाहते थे जो विशुद्ध रूप से उनकी समाजिक, कानूनी स्थिति सुधारने में संजीवनी बूटी की तरह काम करें। इसलिए उन्होंने सौ फीसदी औरतों के हक में ‘हिन्दू कोड‘ बिल बनाया। इस हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर दोनो को ही कट्टर पथियों का भयंकर विरोध सहना पड़ा। हिन्दू कोड बिल के विरोध में डॉ. अम्बेडकर को कई बार व्यक्तिगत अपमान झेलना पड़ा। उनके घर पर पत्थर तक बरसाये गये और संसद में भी उनका बहिष्कार किया गया। ”हिन्दू कोड बिल“ पास कराने के लिए डॉ. अम्बेडकर के साथ-साथ अनेक दलित गैर दलित महिलाओं ने भारतीय महिलाओं की समाजिक व आर्थिक लड़ाई लड़ी है। ”हिन्दू कोड बिल“ पर दुर्गाबाई देशमुख, लोकसभा की सदस्य श्रीमती पदमजी नायडू, राजश्री, सौ. चन्द्रकला, उर्मिला मेहता, मिसेस मिठान महिला कांग्रेस की मन्त्री कुमारी मुकुल और उनके महिला जत्थे ने डॉ. अम्बेडकर के साथ गांव-गांव, नगर-नगर घूमकर सभा और जनसभाओं में भारतीय महिलाओं की समाजिक आर्थिक दुर्दशा के चित्र खींचे।

अक्सर डॉ. अम्बेडकर और महिला साथियों द्वारा आयोजित हिन्दू कोड बिल चर्चा सभाओं में कट्टर पंथियों द्वारा सीधा हमला कर दिया जाता था, और चर्चा सभाओं को जबर्दस्ती बंद करा दिया जाता था। उस समय के अखबार भी ‘हिन्दू कोड बिल के खिलाफ अनेक भड़काउ लेख छाप रहे थे उस समय देश का माहौल डॉ. अम्बेडकर और उनकी महिला साथियों के खिलाफ विषाक्त हो गया था। परन्तु ये सब डटे रहे। आखिर में जब ‘हिन्दू कोड बिल‘ संसद में पास न हो सका तब डॉ. अम्बेडकर ने विरोध स्वरूप संसद से त्यागपत्र दे दिया।

बाबा साहब भारतीय स्त्रियों की उन्नति के लिए जितने प्रगतिशील कदम उठाते उतना ही कट्टरपंथी उनको पीछे खींचने के प्रयास में लगे रहते। कोड बिल जैसे प्रगतिशील कदम से चिढ़कर कट्टरपथिंयों ने डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ चारों तरफ वैमनस्य, घृणा और तनाव का जाल बिछा दिया। पुरूष प्रधान संस्कृति पर प्रहार करते हुए इस बिल ने भारतीय महिलाओं को पुरूषों के बराबर कानूनी अधिकार देकर उनको गौरान्वित किया गया। इस बिल की वजह से हिन्दु स्त्री को विवाह, तलाक, आदि में पुरूषों जैसा ही हक दिया गया था। इस बिल में आठ अधिनियम बनाए गए।

1     हिन्दू विवाह अधिनियम।

2     विशेष विवाह अधिनियम।

3     गोद लेना दत्तकग्रहण अल्पायु-संरक्षता अधिनियम।

4     हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम।

5     निर्बल तथा साधनहीन परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण अधिनियम।

6     अप्राप्तवय संरक्षण सम्बन्धी अधिनियम।

7     उत्तराधिकारी अधिनियम

8     हिन्दू विधवा को पुनर्विवाह अधिकार अधिनियम।

9     हिन्दू कोड बिल में पिता की सम्पति में अधिकार आदि।

’हिन्दू कोड बिल द्वारा किसी भी जाति की लड़की या लड़के का विवाह होना अवैद्य नही था। हिन्दू कोड के अनुसार पत्नी और पति एक समय में एक ही विवाह कर सकते थे। अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के रहते और पत्नी पहले पति के रहते विवाह करतें हैं तो उसे कानूनी दण्ड मिलेगा। हिन्दू कोड में पति के मर जाने पर हिन्दू स्त्री को पति की सम्पति में उसकी सन्तान के बराबर हिस्सा या अंश देने का नियम बनाया। हिन्दू धर्म शास्त्रों में विधवा के लिए दूसरी शादी का कोई विधान नही था और न ही जायदाद  उसे कोई में हिस्सा या अंश मिलता था। हिन्दू कोड की कृपा से पिता की मृत्यु के पश्चात् पुत्री को भी भाइयों के बराबर जायदाद का वारिस बना दिया गया था। इसी तरह दत्तक या गोद लेने का अधिकार अपने कुल में से पैदा हुये बच्चे को ही प्राप्त था, किन्तु कोड के अनुसार किसी भी हिन्दू परिवार में जन्मी लड़की या लड़के को गोद लिया जा सकता था और वह लड़का या लड़की चाहे वह किसी भी हिन्दू जाति के हों, गोद लिए जाने वाले की जायदाद के वारिस बन जाते हैं। मजे की बात यह थी कि अब न केवल लड़का ही दत्तक बन सकता था, बल्कि लड़की भी दत्तक ली जा सकती थी। इसलिए संक्षिप्ततः कहा जा सकता है कि हिन्दू कोड ने हिन्दुओं के पुराने धर्मगढ़ को भस्मसात करके रख दिया था। (हिन्दू कोड बिल और अम्बेडकर-सोहनलाल शास्त्री विद्यावाचस्पति)

हिन्दू कोड बिल में इन आठों अधिनियम को पास कराके डॉ. अम्बेडकर स्त्रियों की स्थिति में कानूनी रूप से आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे। हिन्दू कोड बिल द्वारा परिवार व समाज में महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो इसलिए उन्होने परिवार में पुत्री के हैसियत पुत्र बराबर तथा पत्नी की  हैसियत पति बराबर रखी। तलाक देने की स्थिति में पति को पत्नी के गुजारे के लिए गुजारा भत्ता देना पड़ेगा तथा सम्पति बंटवारे में पुत्री को पुत्र के बराबर हिस्सा मिलेगा। महिलाएं भी अपनी मर्जी से बच्चा गोद ले सकती है बच्चे को गोद लेने का अधिकार मिलने पर जिन स्त्रियों के बच्चे नही होते थे, उनको परिवार और समाज द्वारा दिए जा रहे मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से छुटकारा मिल जायेगा। ”हिन्दू कोड बिल“ पर डॉ.अम्बेडकर का मानना था कि वे ”हिन्दू कोड बिल“ पास कराकर भारत की समस्त नारी जाति का कल्याण करना चाहते थे। उन्होने ”हिन्दू कोड बिल“ पर विचार होने वाले दिनों में अनेक सवर्ण जाति से सम्बन्ध रखने वाली क्रूर अत्याचारी, शराबी, कबाबी, ऐबी पतियों द्वारा परित्यक्ता अनेक युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को देखा था, जिन्हे उनके पतियों ने त्यागकर उनके जीवन-निर्वाह के लिए नाममात्र का चार-पांच रूपया मासिक गुजारा-भत्ता बांधा हुआ था। अक्सर तो पति इतना भत्ता भी नहीं देते थे। ये परित्यक्ता औरतें गुलामी और दरिद्रता भरा जीवन जीने को मजबूर थीं। इन औरतों की ऐसी दयनीय दशा को देखकर इनके माता-पिता, भाई-बन्धू भी दुःखी रहते थे। क्योंकि इन परित्यक्ता औरतों के दुःख को खत्म करने वाला, कोई कानून नहीं था। ‘हिन्दू कोड बिल ही वह कानून हो सकता था जो ऐसी दीनहीन, दुःखी-सताई औरतें के पक्ष में खड़ा हो सकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘हिन्दू कोड बिल भारतीय स्त्रियों की सोचनीय दशा में आमूल-चूल परिवार्तन लाने वाला कानून था। जिसमें समाज में किसी भी रूप व परिस्थिति में सताई गई औरतों के हक में दोषियों के लिए दण्ड का प्रावधान था। इस बिल के द्वारा डॉ. अम्बेडकर और उनकी महिला साथी महिलाओं की स्थिति में कानूनी सुधार व हक के लिए प्रयास कर रहे थे। हिन्दू कोड बिल के समर्थन में 21 अगस्त 1949 में दादर के भंडारी हाल में एक परिषद आयोजित की गई जिसमें 25 महिला संगठनों और 10 सामाजिक संगठनों ने हिन्दू कोड बिल के समर्थन में सरकार को मांग पत्र सौंपा गया। 19 जनवरी 1950 में विल्सन कालेज में 05:30 बजे हिन्दू कोड बिल के समर्थन में उर्मिला मेहता व श्रीमती मिठान ने अपने धुआंधार भाषणो द्वारा हिन्दू कोड बिल का जोरदार समर्थन किया। यह आन्दोलन लगभग 5 सालों तक चला जिसमें अनेको-अनेक दलित व गैर दलित महिलाएं जुड़ी। इस आन्दोलन का मकसद ही समाजिक न्याय दिलाना था जिसका वर्षों से हनन होता आ रहा था।

सन्दर्भ पुस्तकें एवम् सन्दर्भ लेख

1  सचित्र भीम जीवनी रचनाकार शान्तस्वरूप शान्त

2  समाजिक न्याय के पुरस्कर्ता डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. ब्रजलाल वर्मा

3  हिन्दू कोड बिल और डॉ. अम्बेडकर-सोहन लाल शास्त्री विधावाचस्पति

4  भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. आम्बेडकर- डॉ. कुसुम मेधवाल

5  दलित महिलाएं – डॉ. मंजू मोहन सम्यक प्रकाशन

6  दलित नारी – एक विमर्श – डॉ. मंजू मोहन सम्यक प्रकशन

7  डॉ. अम्बेडकर- लाईफ ऐण्ड मिशन- धनंजय कीर

8  आम्ही इतिहास घड़वला-उर्मिला पवार, मीनाक्षी मून ;पेज 70 से 94 तक

9  अभिमूक नायक – दिसम्बर 2004 सम्मान की आवाज विशेषांक

10 दोनों गालों पर थप्पड़/दलित महिलाएं: दुहरा शोषण , दुहरा संघर्ष – मोहनदास नैमिशराय

11 स्त्री मुक्ति और महिला आन्दोलन- गीता श्री

12 महिला आन्दोलन में दलित महिलाओं का योगदान- मोहनदास नैमिशराय

13 दलित नारीः समाजिक विकास और डॉ. अम्बेडकर- डॉ. एच.एम बरूआ

14 दलित नारी: कल आज और कल – एक विवेचन – डॉ. कुसुम मेधवाल

15 महाड़ सत्याग्रह- डॉ. कुसुम मेधवालः भारतीय नारी के उद्धारक डॉ. बी. आर. अम्बेडकर

लेखक  – अनिता भारती (अनिता भारती चर्चित दलित लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता है। )

यह लेख पहले दायरा पर छापा गया था।

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