अनपढ़ लेखक की सामाजिक, राजनीतिक एवं साहित्यक यात्रा 


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सफ़ेद धोती सफ़ेद कुर्ता,आँखों में सामाजिक उद्धान की प्रतिबद्धता और शरीर में प्रतिबद्धता को प्रतिपादित करने की ऊर्जा मुंशीजी की यह छवि मिलने वालो के मन में सहज स्थान बना लेती थी।

इस छवि के पीछे का संगर्ष जानने योग्य और प्रेरणादायी है।

मुंशी एन .एल .खोब्रागड़े 11 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में जन्मे, घर में पैसो की

किल्लत थी और घरेलु ज़िम्मेदारियाँ भी जिसके चलते वह कक्षा तीसरी भी पूरी न कर पाये। इस हेतू दूसरी तक पड़ा लिखा व्यक्ति अनपढ़ कहे जाने योग्य ही है, यह अनपढ़ कहे जाने वाले व्यक्ति ने समाजसेवा और साहित्य सृजन के छेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त विद्वान व्यक्तियो को भी पीछे छोड़ दिया। उन्होंने जो उपलब्धिया प्राप्त की वो प्रसंसिन्य ही नहीं उल्लेखनिय भी है।

किशोरावस्ता में मुंशीजी स्वामी मुक्तानंद की ओर आकृस्ट हुये और योग और ध्यान में दीक्षित होकर सन्यास लेने का आग्रह किया।ऊँच-निच,छुआ-छूत से ग्रषित भारत की विकृत समाज वयवस्था सन्यास में आड़े आई। मुक्तानंद ने मुंशीजी की इस इच्छा को जाति के आधार पे अस्वीकृत कर दिया।

इस बात का मुंशीजी के मन पे गहरा प्रभाव पड़ा तथा उन्होंने छुआ-छूत और जात-पात के खिलाफ लड़ने का मन बना लिया। स्वयं लिखित फ़ाग गीतों और नाटय के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों,जात-पात,छुआ-छूत के विरोध में स्वर मुखर किये।

मुंशीजी का विवाह 12 वर्ष की उम्र में हो चूका था पत्नी 9 वर्ष की थी.यह उम्र किसी भी बालक के लिए खेलने कूदने और बाल सुलभ हरकते करने की होती है। नाथूलाल इसके विपरीत सदैव चिंतनशील और विचारो में डूबे हुये रहते थे। इसी दौरान हिन्दू धर्म की अछाई बुराई से परिचित होने का विचार कर हिन्दू धर्म के धार्मिक ग्रंथो का पढन पाठन आरंभ किया। उन्होंने प्रेमसागर,सुखसागर,महाभारत ,तुलसीकृत रामायण,भगवत गीता आदि किताबे पड़ी।

1946 में उनकी भेंट ओंकार दास बोम्बर्डे से हुई और यहीं से उनकी सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों का सफर शुरू हुआ आगे की गतिविधियों में, सन 1948 में ‘समाज सुधार मण्डल’ का गठन हुआ। खोब्रागड़े जी को इसका सेक्रेटरी बनाया गया।

दलित समाज में अन्धविश्वास एवं मजबूरियों के चलते पनपी कुरीतियां एवं कार्य समाज की यथास्थिति को बनाये रखने में बड़े बाधक थे । इनमे मुख्यत मरे हुए जानवर का मास खाना, अन्य लोगोँ के शादी-विवाह आदि कार्यों में नगारचियो के साथ मिलकर बाजा बजाना, त्योहारों में अन्य जाति के लोगो के घर से पकवान मांगना, एवं दूसरे समाज की महिलाओ की डिलिवरी में दाई का काम करना आदि, बहुत कुछ शामिल है। भारत की आज़ादी के पश्चात दलित समाज में प्रचलित कुरीतियो को समाप्त करने का काम समाज सुधर मण्डल के तत्वाधान में ही चलाया गया। इन कुरीतियों से निजात दिलाने के लिए खोब्रागड़े ने गांवो में सभाएं की एवं शादी विवाह में चेतना जगाने वाले एवं प्रेरित करने वाले गीतों से समाज को जगाया।

1946 से ही बाबासाहेब के मिशन के तहत सामाजिक और राजनैतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए घर छोड़ पैदल जंगलो और पहाड़ो में जहां-जहां समाज के लोग रहते थे,वहा जाते और समाज में प्रचलित कुरीतियों को समाप्त करने एवं समाज को एक आदर्श समाज बनाने के लिए ताउम्र

परिश्रम करते रहे।

सदियों से प्रचलित कुरीतियों को छोड़ने समाज के लोग आसानी से तैयार नहीं होते थे,रात-रात भर सभाये चलती थी जब लोग नहीं मानते थे तो अर्थ दंड एवं सामाजिक बहिस्कार किया जाता था

मुंशीजी जब समाज सुधार के काम से घर से बाहर जाते तो महीनो तक नहीं लौटते, परिवार की हालत बहुत नाजुक थी पत्नी मजदूरी करती थी। घर में कभी चूल्हा जलता तो कभी पूरा परिवार भूखा ही सो जाता। यह स्थिति कई वर्षो तक चलती रही।

जब वे गांव छोड़कर बालाघाट आगये और एम.डी मेश्राम वकील के पास मुंशी का काम करने लगे,तब जाकर स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ। परिवार को भी बालाघाट बुलवा लिया और बच्चे बढ़ने लगे।

जब समाज के लोगो ने हिन्दुओ के गन्दे काम करना बंद कर दिया तो  हिन्दुओ ने महार समाज़ के लोगो का सामाजिक बहिस्कार कर दिया। सामान लेना -देना ,काम -धंदा और खेतो में शौच जाना तक बंद करवा दिया।उलंघन करने पर झगड़े होते मारपीट होती , मुंशीजी को भी दंगाईयो की लाडियो का शिकार होना पड़ता था

खोब्रागड़े जी ने कोटवारों के अधिकारों की भी लड़ाई लड़ी। 1948 में साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया। इसी वर्ष कोटवारों की समस्या पर गीत लिखा जो म प्र से प्रकाशित होने वाली पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इस गीत को पुलिश प्रसासन ने पुरुस्कृत किया।

आपने 1948 से ही पत्र पत्रिकाओ में लेख लिखना आरंभ कर दिया था। आपके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, साहित्यिक,शाक्चर्डिक,तत्कालिक विभिन् विषय पर विभिन् पत्र पत्रिकाओ में 70 से 80 लेख प्रकाशित हो चुके है। आपने 18 से 20 पुस्तके लिखीं जिसमे मुख्यत “भारत की विकृत समाज वयवस्था” है  जिसपर तीव्र आंदोलन होकर तत्कालीन प्रशासन ने जहाँ इस पुस्तक को जप्त कर लिया था। वही म प्र शासन  और केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने पुरस्कृत किया।             इस किताब की वजह से मुंशीजी के घर तोड़-फोड़ हुई ,मकान जलाने की चेस्टा की गई। 1 वर्ष तक भूमिगत रहना पड़ा,  महीना भर जेल में रखा गया ,11 वर्षो  तक केस चला। अंततः विजय हमारी हुई।

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दूसरी किताब “मध्य प्रान्त में दलित आंदोलन का इतिहास” जो 425 पेज की हैं जिसपर दिल्ली, बिलासपुर एवं बालाघाट के छात्रों द्वारा शोधप्रबंध लिखकर डॉक्ट्रेट किया गया।

मुंशीजी डॉ आंबेडकर के समाज सुधार आन्दोलन से लगातार जुड़े रहे. बाबासाहेब द्वारा प्रकाशित पत्रिका “प्रबुद्ध भारत”,ऊर्जा का संचार करती रही

बाबासाहब ने 13 सितम्बर 1956 में धर्म परिवर्तन की घोस्णा की थी। आप 2 दिन पहले ही नागपुर पहुंच गए, 14 अक्टुबर 1956 नागपुर की दीक्षा भूमि में जिन सौभाग्यशाली लोगो ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर,भारत के इतिहास को बदलकर,समता-समानता मूलक भविष्य की नींव रखी,उन 5 लाख लोगो में, रजिस्ट्रेशन नं 62557 लिए एक युवक नाथूलाल खोब्रागडे भी था।

“आंबेडकर” इस विचार से सक्ष्ताकार हो चूका था, उस दिन “आंबेडकर” एक व्यक्तित्व से मिलकर  नाथूलाल भाव विभोर हो उठा। वह दिन था 15 अक्टुबर 1956 नागपुर की श्याम होटल।

युग प्रवर्तक को वंदन करने का सौभाग्य नाथूलाल को मिला। मन पर आंबेडकर के विचारो और व्यक्तित्व की प्रेरक छाप अजीवन बनी रही।

दलित आंदोलन में और बौद्ध धर्म के प्रचार में आपका सफर बहुत लम्बा और अनेक अनुभवों से भरा हुआ है। आप शेडूलेड कास्ट फेडरेशन, रिपब्लिक पार्टी, समाज सुधर मंडल, भारतीय बौद्ध महासभा, बालाघाट जिला बौद्ध संघ, दलित साहित्य अकादमी, अल्पसंख्यक समिति, शांति समिति, एकता समिति, इत्यादि अनके संस्थाओ के विभिन्न पदो पर कुशलता पूर्वक कार्य किया।

खोब्रागडे जी ने समाज और दलित साहित्य की सेवा करते हुऐ ,सम्मानित,संतोषप्रद प्रेरणादायी स्वास्थ्य एवं दिर्घायु जीवन जिया।

16 फरवरी 2017 को 93 वर्ष की आयु में कालकलवित हुये और अपने पीछे वो इतिहास छोड़ गये जो भविष्य को दिशा देता रहेगा।

मुंशीजी को प्राप्त कुछ सम्मान एवं पुरस्कार

  1. दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार 1994
    2. विशिस्ट सेवा सम्मान 1999
    3. मानद फेलोशिप दलित साहित्य अकादमी उज्जैन 1997
    4. प्रदिनिधि अनुशंषा पत्र दलित साहित्य अकादमी डेल्ही
    5. महात्मा ज्योतिबा फुले फेलोशिप डेल्ही 2001
    6. इंडो जापान बुद्धिस्ट फ्रेंड्स एसोसिएशन दवारा सम्मान
    7. जिला पत्र -लेखक संघ और ऑल इंडिया समता सैनक दल दवारा सम्मान 2002
    8. इतिहास और पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा सरस्वती साहित्य सम्मान 2005
    9. केन्द्र सासन संस्कृति विभाग से उत्कृस्ट साहित्य सेवा के लिये आर्थिक सहायता 1995 से 2008

मुंशीजी द्वारा रचित पुस्तकें। 

1. मध्य प्रान्त में दलित आन्दोलन का इतिहास
2. बौद्धकालीन भारत का इतिहास
3. यथार्थ का आइना (आलेख संग्रह )
4. बौधो के दायित्व
5. क्या यीशु मसीह बौद्ध थे (शोध ग्रन्थ )
6. गृहस्तो के लिये भगवान बुद्ध का संदेश
7. तत्व ज्ञान प्रश्नोत्तरी
8. सम्राट अशोक के शिलालेख
9. भारत की विक्रत समाज व्यवस्था
10. बौद्धों की आचार संहिता
11. ऐसे थे भगवान बुद्ध
12. भारत के बौद्ध तीर्थ और सांस्कृतिक स्थल
13. भारत के विष्व प्रसिद्ध बौद्ध विश्वविध्यालय
14. भारत से बौद्ध धर्म के पतन के सडयंत्र का भांडाफोड़
15. बौद्ध धर्म के सन्दर्भ में बुद्धिजीवियो के विचार
16. विश्व का बौद्ध कालीन इतिहास
17. अछूत की बेटी (उपन्यास )
18. बौद्ध धर्म की विदेश यात्रा
19. भारत के मूलनिवासियो का प्राचीन इतिहास और की जा रही पुरातत्वीय साक्ष्य को जूठलाने की साजिश
20. भगवान बुद्ध का धम्म दर्शन कविता में

Author – Pragya Chouhan

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