धर्म-संगत – एक कहानी


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छोटा सा गांव था, पच्चीस-तीस घर ब्राह्मणों के और आठ-दस झोपड़ियाँ कुम्हारों की थी। घड़े बनाते और गधों पर लादकर गांव-गांव बेंचकर अपनी गुजर-बसर करते।

वैद्यनाथ और दीनानाथ दो ब्राह्मण थे दोनों ही एक नम्बर के कामचोर। कुछ काम-धंधा करते नहीं थे। बस इधर-उधर दूसरों की बहू-बेटियों पर गंदी नजर से देखना ही उनका काम था।

दोनों चबूतरे पर बैठे थे कि फगुनिया का निकलना हुआ…

दीनानाथ देख तो कैसे लड़खती-फड़कती हुई जा रही आजकल तो कुम्हरन की लुगईयाँ भी कम अति न मचाये हैं

अरे वैद्यनाथ सही ही कह रहे तुम, हम तो कह रहे एक रात के लये मिल जाये बस, बाद में बैशक गंगा नहाये के शुद्ध हो लेवेंगे…

और दोनों जोर से हँस पड़े…

फगुनिया क्या करती बेचारी सुनकर सहन करली, ये पहली बार न था। वो जानती थी उनसे मुँह से लगने से कोई फायदा तो है नहीं, उनकी जात ही ऐसी है।

जाड़े के दिन लग गये थे, अंधरिया रातें भी शुरु हो गई थी। फगुनिया और उसका पति तिलका दिनभर मेहनत करने के बाद थकाबट के मारे पैर पसारे सो रहे थे।

इधर वैद्यनाथ और दीनानाथ की कामुक इच्छाओं की तृप्ति न होने के कारण यौन कुंठित हो चुके थे ऊपर से जाड़े के दिन।

जब दोनों को अपनी कुंठा मिटाने के लिये कुछ न सूझा तो तिलका की झोपड़ी के बाहर बंधी गधी को निशाना बना लिया। ये कई दिन तक चलता रहा। उनका रोज का ही रुटीन बन गया।

तिलका को एक रात मुतास लगी और बाटरी का उजाला करके जैसे ही बाहर निकला तो नजारा देखते ही तिलका की चीख निकल गई, वैद्यनाथ और दीनानाथ घबरा गये अब क्या करें गांव के लोगों को पता चला तो क्या कहेंगे…

उधर चीख सुनकर गांव के कुछ लोग तुरंत घरों और झोपड़ियों से बाहर निकल आये, उन्होंने पूछा क्या हुआ क्या हुआ तिलका काहे इत्ती रात के चिल्ला रहा कोई बात है गई का….?

वैद्यनाथ और दीनानाथ दोनों इशारा करके गांव वालों को बताने के लिये मना करते हैं पर तिलका ने हिम्मत करके बता ही दिया। गांव के लोगों ने कहा इसका अब सुबह पंचायत में फैसला लिया जावेगा कि क्या करना है क्या नहीं। पंचायत जो कहेगी वही सर्वमान्य होगा।

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सुबह हुई गांव के लोग धीरे-धीरे इकठ्ठे होने शुरु हुऐ सभी वहाँ मानो जैसे बूंदी के लड्डू बंटने वाले हो।

पंच भी आ गये सभी पंच ब्राह्मण ही थे…

पंचों ने तिलका की बात सुनी फिर वैद्यनाथ और दीनानाथ से कहा कि तुम्हें कुछ सफाई पेश करनी है क्या…?

वैद्यनाथ ने रात को ही अपना पक्ष रखने के लिये तैयारी करली थी और तपाक से बोला- कि हमने गधी के साथ संबंध बनाकर कोई अधर्म नहीं किया…हमने जो भी किया वो धर्मसंगत है।

वो कैसे…?

उसने उदाहरण देते हुऐ कहा-

“ऋषि किन्दम ने हिरनी से, सूर्य ने घोड़ी से संभोग किया था। तो हमने गधी से कर लिया तो कौनसा पाप कर दिया…”

आगे दीनानाथ ने भी सीधा खजुराओ का उदाहरण दे दिया।

बोला- वैद्यनाथ कुछ भी गलत नहीं कह रहा हमने कोई पाप नहीं किया खजुराओ में भी घोड़े के साथ पुरुष संभोग करता हुआ दिखाया गया है हम ब्राह्मणों की संस्कृति रही है ये…

पंचायत ने दोनों की बात सुनी तो उनके पास भी कोई जवाब नहीं था। उन्होंने दोनों को गधी से संभोग करना धर्मसंगत बताते हुऐ कोई अधर्म नहीं किया कहते हुऐ बरी कर दिया।

वैसे भी ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण को सजा कैसे दे सकते थे भला, चाहे  कितना भी कोई बुरा हो…

रामचरितमानस भी कहती है-

“पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।”

पंचायत खत्म होती है ब्राह्मण अपने घरों में जाते हैं कुम्हार अपनी झोपड़ियों की तरफ आपस में बातें करते हुऐ जाते हैं…

…अब तो हमें इन बामनों से बचाने के लिये अपने जानवरों को भी अंदर ही बांधना पड़ेगा…नहीं तो इन नाशपीटें ब्राह्मणों को पशुओं के साथ संभोग करने का भी लाइसेंस भी मिल गया है अब तो…

लेखक – सत्येंद्र सिंह

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