दलित बहुजन समाज में मोटिवेशनल वैक्यूम


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मैं जिला प्रतापगढ़ UP में पैदा हुआ और जिला इलाहाबाद UP में पला बढ़ा ,यहां  सफाई का काम करने वाले लोगों को हेला, जमादार, भंगी और मेहतर जैसे नामों से जाना जाता | इन Titles  के अंदर भी दर्जनों subtitles जैसे बारा लोटिया, बनौधा,  अंडा चोर, खौसिया, शहरदार,  हलालखोर और जाने क्या क्या उसी  ‘अमानवीय  व्यवस्था’  के  ऊंच नीच के क्रम में  होती है| आश्चर्य और दुःख की बात है जिस ‘अमानवीय व्यवस्था’ की वजह से ये समाज इतना घृणित समझा गया ,ऐसा अस्वास्थ्यकर , अपमान युक्त, जान के जोखिम और शोषण से भरा जीवन जीने को बाध्य हुआ,  उसी व्यवस्था और विचारधारा रूपी ‘मल’ को  बड़े गर्व से अपने सर पर ढो रहा  है |  मैं ‘हेला’ बिरादरी से सम्बन्ध रखता हूँ , ‘हेला’ बिरादरी के लोग खुद को मेहतर या भंगी कहलाना  पसंद नहीं करते, कुछ लोग अपनी title वाल्मीकि लिखना पसंद करते हैं, कुछ चन्द्रा, लेकिन title बदल लेने से पहचान नहीं बदल पाती | ( मैं इनमें से कुछ भी कहलाना पसंद करूंगा, वाल्मीकि को छोड़ के क्योंकि ये title मुझे बनावटी और थोपा हुआ लगता है) |

जैसा की ज्यादातर  लोग समझते हैं  कि हमारा एकमात्र काम सफाई होता है,  पूरी तरह से सही नहीं है , हममें से कुछ लोग सूअर पालन जैसे व्यवसाय में भी हैं (एक विडम्बना ही है कि बाकी के लोग जो सूअर नहीं पालते, सूअर पलने वालों के साथ उठना -बैठना और वैवाहिक सम्बन्ध जोड़ना पसंद नहीं करते )|  ‘हेला’ बिरादरी को अपने ‘म्यूजिक’ और ‘क्राफ्ट स्किल’ के लिए भी स्थानीय स्तर पर  जाना और सराहा जाता है, मगर  प्रतिभाशाली होने के बावजूद बड़े मंचों पर हमारी उपस्थिति और पहचान दर्ज़ नहीं हो पाती |  लोग हमें  एक ही समय में  ‘कलाकार’ और ‘अछूत’ दोनों ही मानते हैं |  मेरे बाबा इलाके भर में शहनाई के माने हुए कलाकार थे,  मेरे पिता जी कव्वाली में ढोलक बजाते और गाते थे,  मेरे चाचा ने ७-८ साल कि उम्र से ही नौटंकी में नक्कारा बजाना शुरू कर दिए था ,  वो तब इतने छोटे थे कि नगाड़े के पीछे दिखाई ही नहीं पड़ते थे,  बाबू गंज (पूर्व सपा मंत्री राजा भैया की ‘भदरी’ रियासत में ) के प्रसिद्द मेले में उन्हें पब्लिक ने ‘नन्हा मुन्ना नक्कारची’ का नाम दिया |  जो लोग नौटंकी,  नक्कारची और कव्वाली के बारे में जानते हैं उन्हें पता होगा कि, ये रात भर का काम है , जिसमें कलाकारी के साथ -२ भारी मेहनत भी लगती है,  तो ! हम न तो बुद्धिहीन हैं न ही कामचोर | हमारे यहां का सूप (जिसमें चावल और अन्य अनाज पछोरते हैं) कोसों दूर तक मशहूर है, दसियों साल इस्तेमाल करने के बावजूद उसका एक बंधना नहीं खुलता, ये हमारी दस्तकारी  है | ढोलक, नगाड़ा,  डफला,  ताशा  हम बढ़िया बनाते भी है और बजाते भी |  गावों की ‘देबी – देउता  पुजइया’ बिना हमारे ‘बधइया’ बजाये पूरी नहीं होती |  बैंड-बाजा पार्टी जिसके बिना शादी, ‘शादी’ नहीं लगती,  हमारा पुश्तैनी धंधा है |  हमारे यहाँ हर पुरुष सदस्य कोई न कोई वाद्ययंत्र जरूर  बजाता है (स्त्रियों के मामले में यहां भी वही रूढ़िवादी, पितृसत्तात्मक , पुरुषवाद व्याप्त है ) और ये सब हम बिना किसी औपचारिक शिक्षा के, अपनी लगन और कोशिशों से न्यूनतम संसाधनों में सीखते है |

नयी तकनीक के आ जाने से हमारा भी धंधा  मंदा पड़ा है लेकिन सफाई के काम में हम सबको मिले १०० % आरक्षण से मिली नौकरियो ने  हमें भूखों मरने से बचा रखा है |  नई तकनीक अभी तक हमसे ये,  manual scavenging  वाला काम छीन कर हमें बेरोज़गार नहीं कर पाई  है |  आज भी हमारे पास (सीवर में मौत  के) अवसरों  की कमी नहीं है,  हम आज भी  गटर में मर रहे हैं |  बात  ऐसी  है  की  sewage  worker   को  पता  ही  नहीं  की  sewer, ‘सुरक्षा  सूट ‘ और  equipment   के  साथ  साफ़  किया  जाता  है .ऐसा  कोई  ‘दृश्य’  उन्होंने  अपनी  ज़िंदगी  में  कभी   देखा  ही  नहीं (प्रॉपर  equipment के  साथ  सफाई  करने  का )  वो आज के चंद्रयान- मंगलयान वाले युग में भी  सिर्फ  दारु का पौआ लगा के , कमर में रस्सी  बांध  कर,  एक  माचिस  की  तीली  जलाकर गैस चेक करके  नंगे बदन  गटर  में  उतर  जाते  हैं |  सफाई  कर्मचारियों  का  नेता  भी  ज्यादातर  अनपढ़  या  कम  पढ़ा  लिखा  होता   है  और  वो  आंदोलन  के  नाम  पर  हड़ताल  तब  करता  है  जब  कर्मचारियों  की  सैलरी  ,’निगम’   ५ -६  महीने या साल भर  से  रोके  हुए  होता  है |  ‘ओम  प्रकाश  वाल्मीकि’, ‘वेजवाडा  विल्सन’,  ‘ डा. कौशल पंवार’  या  ‘ डा. सुनील यादव’ जैसे  लोगों  का   संघर्ष अभी भी बहुतों तक नहीं पहुंचा है | हमारे समाज में अगर कोई सफाई का काम करना चाहता है तो वो बेरोज़गार नहीं है ( हाँ लेकिन दूसरे कामों के लिए ऐसी गारंटी नहीं है, जैसे कि हम कुक नहीं बन सकते और खाने पीने की चीज़ों का व्यापार नहीं कर सकते ) |  हमारा समाज खाने-‘पीने’ (केवल ‘मांस – मदिरा’ और अनाज !  सब्जी – सलाद और दूध – फल तो घास – फूस और ‘फालतू खर्चा’ है )  और पहनने-ओढ़ने का भी बड़ा शौकीन है,  आय का एक बड़ा हिस्सा ये इसी पे खर्च करता है |

अकादमिक शिक्षा में हमारी अरुचि स्वाभाविक नहीं प्रायोजित है | आज से एक-दो पीढ़ी पहले जब इस समाज के बच्चे स्कूल जाया करते थे तो मास्टर इन्हे बहुत मारते थे ताकि ये हतोत्साहित होकर स्कूल छोड़ दें (आज भी अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादातर ‘मास्टर’ यही कर रहे हैं)| मार के डर से कुछ भाग गए और कुछ डटे रहे ,जो भाग गए उनका रुख शिक्षा के प्रति पलायन वादी हो गया और वो ‘वैचारिक अंधकार’ में रह गए, जो डटे रहे वो आगे तो निकल गए लेकिन उन्होंने खुद को बाकी के समाज से अलग कर लिया (वजह वही जाने) | इस घटनाक्रम से हमारी आज की पीढ़ी के सामने ‘मोटिवेशनल वैक्यूम’ की स्थिति जो कि भर सकती थी जस की तस रह गयी | अकादमिक शिक्षा में अरुचि के लिए मैं इसे बड़ी वजह मानता हूँ |

मोटिवेशन कहीं से भी आ सकता है, किताब में किसी की जीवनी पढ़ कर भी आप मोटीवेट हो सकते हो लेकिन अगर आप के आसपास सिर्फ पलायनवादी और वैचारिक अँधेरे में डूबे, हतोत्साहित करते  लोग (माँ-बाप,परिवार के लोग, रिश्तेदार, दोस्त आदि) ही हों तो अपना मोटिवेशन बनाये रखना बड़ा मुश्किल हो जाता है | जब आप शिक्षित (सफल) व्यक्तियों (माँ-बाप,परिवार के लोग, रिश्तेदार, दोस्त आदि ) से और शिक्षित (सफल) व्यक्ति आप से घुलते मिलते हैं तो सकारात्मक ऊर्जा का एक प्रवाह बनता है जो की आपको भी शिक्षा (सफलता) की ओर ले जाता है | मैं अपने समाज में इसी ‘सकारात्मक ऊर्जा’ के निरंतर प्रवाह का अभाव पाता हूँ | (क्योंकि समाज के बाहर के दोस्त और शिक्षक ज्यादा घुलना मिलना पसंद नहीं करते, और अंदर वाले तो पहले से ही दूरी बनाये हुए हैं)

हमारे पुरखों को अपने ही बिरादरी तक सीमित (हतोत्साहित) कर दिया गया (जैसे अच्छा पहलवान होने के बावजूद मेरे परनाना को कुश्ती छोड़नी पड़ी क्योंकि ठाकुर साहब को हार जाने का डर था), फिर आगे जाके पुरखों ने खुद अपने आप को ही सीमित (हतोत्साहित) करना शुरू कर दिया | उनकी सारी प्रतियोगिता हेला समाज से ही शुरू और वहीं ख़त्म होती है | ये समाज, समाज के अन्य विकसित वर्गों से प्रतियोगिता करने कि सोचता भी नहीं, बहुत ज्यादा किया तो उनके जैसा मंहगा कपडा या जूता खरीद के पहन लिया, किसी से भी शिक्षा में  प्रतियोगिता नहीं करता | वर्षों से हमारे समाज का बड़ा हिस्सा अस्पतालों, विश्वविद्यालयो, कलक्ट्रेटों, हाईकोर्टों आदि में झाड़ू लगा रहा है, इतना करीब होने के बावजूद अपने बच्चों को डॉक्टर, प्रोफेसर, आईएएस, वकील, जज बनाने का सपना भी नहीं देखता क्योंकि वो खुद को मानसिक रूप से सीमित (हतोत्साहित) कर चुका है | वो सफाई के काम को ‘अपना काम’ बोलता है, सोचिये ! कितना खतरनाक ‘mental barrier’ है ये (आपको इस ‘mental barrier’ की क्या वजह लगती है ?)| यही ‘mental barrier’ वो अगली पीढ़ी पर भी थोप देता है | मुझे ‘डोर’ फिल्म का एक डायलाग याद आता है, कभीकभी हमें रोकने वाला सबसे बड़ा संतरी होता हैं हमारा अपना डर……अपने आप के लिए जीना स्वार्थ हैं, पर अपनी ख्वाहिशो का गला घोटना उससे भी बड़ा गुनाह | वर्षों की ‘कंडीशनिंग’ से पैदा हुआ ये ‘डर’ (mental barrier) हमें हमेशा कुछ नया करने से रोकता है और हमें  हमेशा अपनी ख्वाहिशो का गला घोटना पड़ता है | हमारे समाज के लोगों के विचारों में ठहराव है, गतिशीलता नहीं है, वो आज भी उसी अंधकार युग में जी रहे हैं और हमें भी उसी युग में जीने को विवश करते हैं | “वैचारिक अँधेरा किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की तरलता ख़त्म कर देता है और उसे जड़ बना देता है” | इसी जड़ता के कारण हमारे माँ बाप और बड़ो को हमारी सही बात भी सुनने, मानने और हमारे कहे अनुसार चलने में बेइज़्ज़ती का अनुभव होता है | दुनियादारी के नाम पे उन्होंने भी समाज का ‘ज़हर’ ही सोखा है जिसे वो हमारी ज़िन्दगी में भी घोल देते हैं |

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हमारे समाज के ज्यादातर लोग अब सरकारी नौकरियों में हैं, इसलिए ये कहना कि, ‘हमारे पास पढ़ने के लिए पैसे नहीं’, गलत होगा | हमारा ही समाज देखा-देखी बर्थडे, शादियों, तीर्थ यात्राओं ,झाड़ फूंकों, धार्मिक आयोजनों आदि में अपनी औकात से ज्यादा ही खर्च कर देता है | असली बात ये है कि शिक्षा में किया गया investment इन्हे profitable investment नहीं लगता (इसके बजाय वो सफाई कर्मी की नौकरी के लिए घूस देना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं )|

आजकल बच्चों को स्कूल तो लगभग सब भेजते हैं लेकिन उनकी प्राथमिक शिक्षा और रूचि को महत्त्व बहुत कम लोग ही देते हैं | वो खुद कुछ नया जानना या पढ़ना पसंद नहीं करते इसलिए खुद का ‘mental barrier’ तोड़ने और अपने बच्चों को सही दिशा देने  में असमर्थ है | अपने बच्चों की शिक्षा के  दौरान घर के माहोल को पढाई के अनुकूल, तर्क पूर्ण और वैज्ञानिक बनाने का कोई ख़ास प्रयास नहीं करते , उनके सही पोषण व शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते (‘मानसिक रोग’ के अस्तित्व और प्रभाव  को  ये प्रेत-बाधा मानते हैं ), हाँ लेकिन ! परिवार की बेहतरी और सुख शांति के लिए पूजा पाठ, झाड़ -फूंक, ओझाई – सोखाई, मन्नत – मनौती और धार्मिक आयोजनों में कोई कमी नहीं करते (कई बार झाड़ फूंक को चिकित्सा से ज्यादा महत्त्व देने के कारण सही इलाज के आभाव में बच्चों की मौत भी हो जाती है) | ज्यादातर माँ बाप का व्यवहार भी बच्चों के प्रति मनोवैज्ञानिक नहीं होता, उनके अपने बच्चे ही समाज के एकलौते प्राणी होते हैं जिनके ऊपर वो अपनी भड़ास मनमाने तरीके से निकाल सकते हैं | विद्यालय में अधिकतर शिक्षक भी मनोवैज्ञानिक ढंग से नहीं पढ़ाते और भेदभाव करते हैं | इन सबका नतीजा यही निकलता है कि बच्चे अपने अंदर ‘खुद से सीखने और खोजने की आदत’ नहीं विकसित कर पाते, उन्हें पढाई में मजा नहीं आता और वो हीन भावना जैसे mental imbalance का शिकार हो जाते हैं | जब बच्चे माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचते हैं तो ज्यादातर माँ बाप उन्हें ‘अपने काम’ पे लगा देते हैं और जो अपने आप को ‘जागरूक’ समझते हैं वो बिना अपने बच्चों की क्षमता और रूचि जाने आज कल के चलन के अनुसार उन्हें मेडिकल, इंजीनियरिंग और सिविल सर्विस  की कोचिंगो में अपना ‘भविष्य’ बनाने के लिए ठेल देते हैं, कुछ सफल हो भी जाते होंगे लेकिन मैंने ज्यादातर को असफल ही देखा है |

‘संगीत’ और ‘दस्तकारी’ जो कि हमारा पुश्तैनी धंधा है, इसमें भी मैंने किसी को विश्वविद्यालयी स्तर पर उच्च शिक्षा लेते हुए नहीं देखा | टैलंट हमारे अंदर भी होता है साहब ! पर हमारे टैलंट कि कदर न दुनिया को होती है न ही हमारे माँ- बाप को |  ये  Phd,  M . phil, BHU,  JNU, TISS, G .B . Pant  sansthan, HRI , fine  arts,  animation,  NSD,  FTTI,  NID,  C -DAC,  NALSAR ,  NIFT,  IIM,  IIMC,  IISc  जैसी कुछ  चीज़ें  इसी देश दुनिया  में  हैं ,  हमें, हमारे माँ बाप और समाज  के  लोगों को पता तक नहीं (थोड़ा जागरूक लोग IAS, PCS,  IIT,  AIIMS,  PMT,  JEE ,  CPMT  और अब NEET  को अख़बारों और होर्डिगों की वजह से जानने लगे हैं ) और अगर गलती से कोई बच्चा अपने प्रयासों से इनके बार में जानकारी करके अपनी रूचि  के अनुसार उपरोक्त जैसे किसी सस्थान में जाने का सपना भी देखता  है तो  तिरस्कार  और अविश्वास प्रकट करने में सबसे आगे उसके माँ बाप और घर वाले ही होते हैं |  वही माँ- बाप जो पैसे की कमी बता कर आपके सपनों की  निर्मम हत्या कर  देते हैं, आपकी शादी में सिर्फ दिखावे के लिए लाखों खर्च करने से नहीं चूकते | यहां माँ बाप बच्चो की शिक्षा के लिए नहीं, उनकी शादी के लिए कमाते हैं |  उनके लिए ‘विवाह’ ही वो सबसे बड़ी  ज़िम्मेदारी है जो उन्हें हर हाल में ‘समय’ पर (लड़कियों के लिए १७ -१८ और लड़कों के लिए २०-२५ वर्ष अधिकतम ) निभानी होती है | यहां मैं उसी ‘सकारात्मक ऊर्जा’ की कमी पाता हूँ जो हमें ‘शिक्षित’ माता-पिता, परिवार के लोगों ,रिश्तेदारों, दोस्तों, शिक्षकों से मिलती है |

हम अच्छे ढोलक, नक्कारा, शहनाई, बांसुरी, हारमोनियम, बैगपाइपर, ताशा, डफला, तम्बूरा, बेंजो बजाने वाले, ढोल – नगाड़ा, सूप – सांगड़ा बनाने वाले तो बन जाते हैं, क्योंकि ! इसके लिए environment, guidence और motivation हमें  माता-पिता, परिवार के लोगों और रिश्तेदारों से ही मिल जाता है, लेकिन ! हम अच्छे scholar नहीं बन पाते, क्योंकि ! academic field के लिए आज भी हमारे समाज में ‘मोटिवेशनल वैक्यूम’ की स्थिति है | आप इस बात को ऐसे समझें ! कि, जब भी मेरे दोस्त अपने डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या विदेश  में रहने वाले रिश्तेदारों से प्रेरणा लेते हुए भविष्य में उन्ही के जैसा बन जाने की कहानियां सुनाते थे, और अपने बड़े-बड़े ‘परिचयों’ के बारे में गर्व से बताते थे (ये अहसास कराने के लिए की ये उपलब्धि उनके पास है, और मेरे पास नहीं ) तो मेरे पास बताने के लिए कुछ नहीं होता था |

लेखक – ऋतुराज 

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3 Comments

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  1. 1
    Sanjay Kumar Mali

    Sir Dil Chhu liya Jis elake se aap he usi elake se hum bhaujanwadi bhi he . aap ne yahe lekha likha kar vah kar dikhaya vo hamare bhahujan samaj ko ak nahi rah per le jane ko utasuk he. use jarurat he app jese logo ki jivan me aage aaye or bahujan samaj ka marg darshan kare……

  2. 3
    Harishchandra Sukhdeve

    बहूत पॉवरफुल बयान।

    अभि कुछ दिन पहले फेसबुकपर हमारे एक मित्र ने पोस्ट डाली थी कि जनता और सरकार ने यह प्रथा, manual scavenging, बंद करनी चाहिए। मैने सवाल उठाया कि सरकार और जनता से ज्यादा उस समाज के लोगों को चाहिए कि वह इसे छोड दें. उस पर बहस छिड़ी कि
    इस समाज पर सफाई का काम जबरन थोपा जाता है इसलिए वह छोड नही पाते, जिसका मैने विरोध किया.

    बहस बढती गई और आगे उसका मतलब यह लिया गया कि कुछ privileged dalit जातीयां manual scavenging मे उलझें लोगोंकी व्यथा को समझते नहीं हैं। ईशारा साफ था।

    बाबासाहब से प्रेरणा लेकर बौद्ध बने, अपनी अलग पहचान बनाये लोगों को privileged dalit कहकर फूट डालने का षड्यंत्र सफल होते दिखाई दे रहा है। लेकिन सभी दलित और अछूत जातीयां यह भी जान लें कि इनके मानवीय अधिकारों के लिए यह बौद्ध समाज ही टक्कर दे सकता है, चाहे वह सडक पर हो या बौद्धिक स्तर पर हो।

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