कौन है जो डिजिटल दलित से डर रहा है और बहुजन वेबसाइट पर रोक लगा रहा है?


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फेसबुक पर सुदर्शन न्यूज, इंडिया टीवी और ज़ी न्यूज की दंगाई खबरें चल सकती हैं, RSS के सारे हिंसक पेज चल सकते हैं, अंधविश्वास और पोंगापंथ फैलाने वाले पेज चल सकते हैं, सारे सवर्ण जातिवादी और आरक्षण विरोधी पेज चल सकते हैं, सांप्रदायिकता फल-फूल सकती है। लेकिन बहुजनों का लोकतांत्रिक मंच नेशनल दस्तक नहीं चल सकता।

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फेसबुक द्वारा के नेशनल दस्तक पेज को बाधित करना घोर निंदनीय है। जब धार्मिक उन्माद फैलाने वाले पेज चल रहे, अश्लील पेज चल रहे तो नेशनल दस्तक के साथ फेसबुक के अधिकारी सौतेला व्यवहार क्यो कर रहे। जब की नेशनल दस्तक पर कोई अश्लील बात नहीं होती। सिर्फ इसलिए की यह दलित, आदिवासियों के बारे में लिख रहा। घोर जाति वादी मानसिकता से ग्रस्त है भारत के फेसबुक अधिकारी।

क्यों? ऐसा कोई आरोप नेशनल दस्तक पर नहीं हैं। कनविक्शन तो छोड़िए, कोई मुकदमा तक नहीं है।

कौन है जो डिजिटल दलित से डर रहा है और बहुजन वेबसाइट पर रोक लगा रहा है?

नेशनल दस्तक पर पाबंदी लगने से पहले की इस खबर को देखिए। इस खबर को 2 लाख 36 हजार लोगों ने अपने पेज पर शेयर किया है। बड़े-बड़े मीडिया हाउस की खबरें इतनी शेयर नहीं होतीं।

इसके वीडियो यूट्यूब पर तीस लाख से ज्यादा देखे गए हैं।

यह ब्राह्मणवादियों को क्यों पचेगा?

नेशनल दस्तक एक खासा बड़ा मंच बन चुका है। हालांकि सफर लंबा है। इसकी कामयाबी के बाद सैकड़ों SC, ST, OBC युवाओं में उत्साह आया और वे भी इंटरनेट और यूट्यूब पर अपना मीडिया बना रहे हैं। उनमें कई कामयाबी के रास्ते पर चल पड़े हैं।

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नेशनल दस्तक की सफलता से एक चेन रिएक्शन पैदा हुआ है। इसलिए हमला सीधे इसी पर हुआ है।

वैसे, यह सब करके कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे।

#IAmWithNationalDastak….. लेकिन क्यों?

नेशनल दस्तक ने कोई महान या बड़ा काम नहीं किया है।

मुझे लगता है कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही है उसने पिछले डेढ़ साल में ऐसे कम से कम ढाई सौ बहुजन लेखकों और लेखिकाओं की बातों को अपनी साइट के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंचाया है, जिन्हें अखबार नहीं छापते थे और जिन्हें चैनल नहीं बुलाते थे, लेकिन जो बेहद शानदार और धारदार लिखते हैं।

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मीडिया की नजर में इनका सरनेम इनकी कमजोरी थी।

उनमें से कई लोग अब जाने-पहचाने चेहरे हैं। वे अब नियमित लेखक हैं।

फेसबुक इंडिया के भारतीय मैनेजरों ने आज तक किसी दंगाई-हिंसक-अफवाहबाज पेज या अंधविश्वास फैलाने वाले पेज पर पाबंदी नहीं लगाई. जाने कितने दंगे फेसबुक ने करा दिए. ऐसे पेजों पर कोई रोक नहीं. लेकिन बहुजनों के लोकतांत्रिक पेज पर पाबंदी लगाने के लिए वे तैयार बैठे रहते हैं. इसके लिए वे वजह बताने को भी तैयार नहीं हैं.

क्योंकि बहुजन भी मुंह में जुबां रखते हैं। पाबंदी हटाओ।

— दिलीप मंडल की कलम से

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2 Comments

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  1. 1
    nk

    SC.ST.OBC. smaaj jaag raha hai or aage aa raha hai..nice …hume jaagrook hone ki jrurat hai..or ik dusre ka sath nibhane ki jaroorat hai

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