आरक्षण आर्थिक आधार पर होना बहुत ही स्वार्थी तर्क है


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जी हाँ हो सकता है की आरक्षण का नाम सुनते ही कईयों के मन में घ्रणा उत्पन्न हो जाये और उनके मन में प्रबल राष्ट्रवाद उत्पन्न हो जाये, हो सकता है कईयों को कांग्रेस की धर्म-निरपेक्षता की निति का खयाल आ जाये, लेकिन आरक्षण को भी कई बुद्धिजीवियों ने समाज की आवश्यकता बताया है और कई बुद्धिजीवियों ने इसे सामाजिक टकराव का कारण बताया है और इसे सामाजिक न्याय का कलंक बताया है, आरक्षण शब्द सुनकर ज्यादातर लोगों को अनुसूचित जाति/जनजाति की याद आती होगी, जिसे गाँधी जी ने 1932 में हरिजन (हरि के जन) की संज्ञा दी थी|

कुछ महान बुद्धिजीवी इसे जातिवाद कहतें है जो अभी तक मौजूद है, लेकिन यदि जाति ही न होती तो आरक्षण भी नहीं होता यह बात भी सत्य है, लेकिन जातिवाद को कोसने वाली विचारधारा रखने वाले महान व्यक्तियों को इस बात पर सहमत होना चाहिए की जब आरक्षण नही था, यानि 1000-1932 तक तब क्या इन्होने जाति व्यवस्था का विरोध किया था|

जब दलितों को शुद्र की संज्ञा दी जाति थी और शिक्षा/रोजगार/राजनैतिक/सामाजिक अधिकार इनसे उछूते थे और इन्हें समाज में अछूत कहा जाता था|

और आज जब इनका सामाजिक/राजनैतिक उभार हुआ है तो अब यह जातिवाद बन गया और आरक्षण देश में घातक, पहले तो हमें इस आरक्षण के पीछे की कहानी को समझना होगा, यह दलित वर्ग का तबका उन्नीसवीं सदी तक शिक्षा/रोजगार/समानता/ से अति पिछड़ा रहा है यहाँ तक की यह तबका 1000 वर्ष पूर्व (उत्तर वैदिक काल) अपनी पहचान को ही नही जानता था और धार्मिक कर्म-कन्डो पर अति विश्वास रखता था, लगभग 1000-1900 वर्ष तक शिक्षा/रोजगार/आर्थिक नियोजन/राजनीती/सामाजिक समरसता पर उच्च जातियों का वर्चस्व था, तब एक अघोषित आरक्षण व्याप्त था जिसपर उच्च जातियों का जबरजस्त वर्चस्व था|

हो सकता है तब भी लोग आर्थिक रूप से पिछड़े हो लेकिन तब उच्च जातियों का ध्यान आर्थिक आरक्षण पर नही गया, देश के बाहुल्य साधन/संसाधन ऊँची जातियों के पास हुआ करते थे, आज भी है, कृषि/रोजगार/संपत्ति का अधिकार ऊँची जातियों के पास था जो इन्हें जन्म लेंते ही विरासत में बड़ी आसानी से मिलता था और उच्च जातियों ने इस एकाधिकार को बचाने के लिए तमाम राष्ट्विरोधी कार्य किये, राष्ट्रविरोधी तत्वों का साथ दिया, अंग्रेजो का साथ दिया, मुगलों का साथ दिया, और ऐसे तमाम विरोधो को कुचलते थे जो निम्न जाति वाला अपने सामाजिक अधिकार की मांग करता था|

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सन 1848 से लेकर 1950 तक तमाम धार्मिक सुधारों की पहल भी हुई और दलित वर्ग के उत्थान की मांग उठी, देश के चारो दिशाओं में जबरजस्त हड़ताले हुई, और अघोषित आरक्षित मंदिरों/संस्थानों में अछूतों ने जबरन घुसने का प्रयास किया तथा तमाम ऐसे संगठनों की नीवं रखी गई, जो शोषित/वंचित दलितों को उनके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक अधिकार दिला सके, जैसे-1873 में सत्यशोधक समाज, 1919 में गैर-ब्राह्मण एसोशियशन, 1920 में अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद्, 1932 में आल इण्डिया दिप्रेस्सेड निर्वाचक मंडल, 1932 में अखिल भारतीय हरिजन संघ, 1935 में आल इंडिया दिप्रेस्सेड क्लासेज लीग, 1945 में आल इण्डिया शिदुल कास्ट फेड्रेसन, जैसे तमाम संगठन दलित वर्गों को उनके हित-अधिकार दिलाने में कार्यरत रहे लेकिन इससे दूरगामी और भविष्य में इस समानता की कोई गारंटी नजर नही आती थी फिर तमाम दलित नेताओ ने इस बात पर मंथन किया और समझा की दलितों को यदि राजनैतिक-आर्थिक सरंक्षण प्राप्त हो जाये तो समानता के सारे दरवाजे अपने-आप खुल जायेंगे|

यही दौर था जब देश स्वंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ रहा था और नया उदारवाद आने वाले था और देश लोकतान्त्रिक-गणराज्य बनने को अग्रसर था तथा कांग्रेस अपने राष्ट्रवादी/धर्मनिरपेक्षता का पथ पर डटे हुए थी और ऐसी तमाम आवाज़ को दरकिनार कर रही थी, ऐसा देखते हुए डा0 अम्बेडकर ने कांग्रेस को ब्राहमणवादी संगठन कहा और इसका बहिष्कार करने को कहा तभी गैर-ब्राह्मण के अतिवादी और लोकप्रिय नेता इवी.रामास्वामी पेरियार ने 1925 में कांग्रेस छोड़ दी, अब अंग्रेजो ने इस बहिष्कार को एक बार फिर भुनाने की कोशिस की और अपनी बांटो और राज करो की निति को जिंदा करने की कोशिस की और 1932 में अंग्रेज शासक राम्जे मक्दोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पुरुस्कार को पेश किया जिसमे दलितों को अलग निवार्चक मंडल का प्रावधान था, जिसका अम्बेडकर ने सामूहिक समर्थन किया, यह देखते हुए गाँधी जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके कारण आखिर अम्बेडकर को झुकना पड़ा और सितम्बर 1932 को गाँधी जी और अम्बेडकर के बीच एक समझौता हुआ जिसे पूना एक्ट के रूप में जाना जाता है जिसका समर्थन कांग्रेस ने भी किया, जिसमे दलितों के लिए आम चुनाव में 151 सीटें आरक्षित कर दी गई और फिर दलित वर्ग कांग्रेस में शामिल हो गया और आजादी के लड़ाई लड़ी जिसमे उच्च वर्गों ने हिस्सा नही लिया क्यूंकि वे अंग्रेजी शासन को स्वार्थ हित के लिए अच्छा मानते थे और उनके नौकरशाह थे|

और बाद में अम्बेडकर को सविंधान सभा में प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया और सविंधान लागु होने के बाद अस्पर्श्यता को कानून दंड माना गया (अ-17), और राजनैतिक व्यवस्था में लोकसभा व् राज्यसभा के लिए 30% सीटें दलितों के लिए आरक्षित कर दी गई (अ-330.332) और पंचायती राज में भी 30% आरक्षण दिया गया (अ-243घ) और उसके बाद इसको जनसँख्या की दृष्टि से आगे बढाया गया वर्तमान में यह 2020 तक तथा राष्ट्रिय अनुसूचित जाति आयोग/जनजाति आयोग का गठन किया गया (अ-338-338क), इस तरह दलितों के हितो और आधिकार के लिए बनाये रखने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया, क्यूंकि इसकी कोई गारंटी नही है की कानून से हितो का सरंक्षण किया जा सकता है.

वास्तव में आरक्षण ही पिछड़े और वंचित तबको के हितो का सरंक्षक है|

आज विवाद यह है की आरक्षण आर्थिक हो या जातिगत, इस परिद्रश्य को समझने को लिए हमें देश की व्यवस्था को समझना होगा-

जब देश आजाद हुआ तो देश के पास सबसे बड़ी चुनौती कंगाल भारतीय अर्थव्यस्था को पटरी पर लाना था जिससे देश औधोगिक अर्थव्यवस्था के साथ आगे बड़ा क्यूंकि उस समय तक बाहुल्य संसाधन उच्च वर्ग के पास था, और अच्छे शिक्षित थे इसीलिए जब धीरे-धीरे देश बाजार में बदलना शुरू हुआ तो सबसे ज्यादा उच्च पदों पर उच्च वर्गों के व्यक्ति ही काबिज़ होते चलेगे और इनकी जनसँख्या भी काफी कम थी|

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आज की व्यवस्था समझे तो केवल 2% रोजगार ही सरकारी नौकरिया सृजित करती है वही 34% निजी क्षेत्र और 56% कृषि रोजगार सृजित करती है [Read] तो फिर रोजगार कहाँ है निजी क्षेत्र में और कृषि में और दलितों की हिस्सेदारी को यदि आंके तो अनुसूचित जाति के केवल 0.73% व्यक्ति सरकारी नौकरी में है जबकि पब्लिक सेक्टर में 0.17% और निजी क्षेत्र में 0.45% है [Read] वहीँ अनुसूचित जनजाति में 0.48% लोग सरकारी नौकरी में और पब्लिक सेक्टर में 0.06% और निजी क्षेत्र में 0.16% लोग है. [Read]

इसको दूसरी तरह से समझे तो सच्चर समिति की रिपोर्ट (2005) बताती है की अनुसूचित जाति और जनजाति के 39.5% लोग सरकारी नौकरी में और 9.5% लोग निजी क्षेत्र से जुड़े हुए है और उच्च जातियों के लोग सरकारी नौकरी में 37.4% और निजी क्षेत्र में 17.1% लोग है, [Read]

अब जनसँख्या की दृष्टी से देखें तो 2004-2005 का जातिवार जनसँख्या बताती है की हिन्दुओं में 22.2% अनुसूचित जाति,9.1% अनुसूचित जनजाति,42.8% ओबीसी और 26% उच्च जातियों के लोग है, [Read]

निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है और न ही अनुसूचित जाति के लोगों के पास ज्यादा कृषि है जो सबसे ज्यादा रोजगार देती है तो फिर पिछड़ा कौन है, निजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा उच्च वर्गों के लोग है क्यूंकि वहां नौकरी पाने के लिए योग्यता नहीं बल्कि जान पहचान चाहिए होती है और दलितों के लिंक होते नहीं.

सच्चर समिति की रिपोर्ट बताती है की दलितों की औसत प्रति व्यक्ति आय केवल 520 रु० है, ऐसे में कैसे कोई पढ़ सकता है अच्छे स्कूल और कॉलेज में ? [Read]

उच्च वर्गों और महान बुद्धिजीवियों का तर्क है की आरक्षण आर्थिक होना चाहिए दर्हसल यह बहुत चापलूसी और स्वार्थी तर्क है

समानता के प्रति एक बड़ी साजिश है क्यूंकि देश में किसी व्यक्ति की आर्थिक स्तिथि का पता लगाने के लिए माध्यम केवल सर्वे और आय प्रमाण पत्र है और देश में ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जो अपनी मूल आय को सरकारी लाभ के लिए न छुपाते है, ऐसे बहुत कम ही लोग होंगे जो अपनी आय 10 लाख से ऊपर दिखाते होंगे यानि यदि देश आर्थिक आरक्षण में फसा तो इसका सीधा लाभ उन थोड़े उच्च जातियों को मिल जायेगा जो आर्थिक रूप से मजबूत है और नकली सर्टिफिकेट बनाने में माहिर. और बांकी सब उच्च जातियों के लोग योग्यता की बात करने लगेगे और जब तक एक आर्थिक सर्वे हो पायेगा तब तक ये उच्च पदों का काबिज़ कर दिए जायेंगे/हो जायेंगे क्यूंकि तब योग्यता का मानदण्ड होगा ये योग्य तो वर्षो से है और इनका वर्चस्व निजी क्षेत्र में तो है ही पर सरकारी नौकरियों में भी पूर्ण रूप से हो जायेगा|

देश में लगभग 35% लोग निरक्षर है तो वे अयोग्य भी होंगे और आर्थिक आरक्षण हो जाने पर वे भी आरक्षण मांगेगे जिससे अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग के लोग असमंजस से पड़ जायेंगे और नए संकट उत्पन्न हो जायेंगे, उच्च जाति के लोग आज जनसँख्या में पिछड़े वर्गों की अपेक्षा काफी कम और उनमे से कुछ ही आर्थिक रूप से पिछड़े है तो इन कुछ लोगों के स्वार्थ के लिए आर्थिक आरक्षण का स्वांग रचाया जा रहा है और ये आजकल उग्र राष्ट्रवाद का पाठ दलितों-पिछडो को पढाकर अपना स्वार्थहित चाहते है |

इसका एक उपाय हो सकता है जनसँख्या दृष्टि से आरक्षण दिया जाये, जिसकी जनसँख्या ज्यादा उसे ज्यादा आरक्षण दिया जाये और जिसकी कम उसे कम आरक्षण यही उपाय है|

लेखक – शुभम कमल

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2 Comments

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  1. 1
    Ravi kumar gajbhiye

    Well written,good component.अब ये नया तर्क सामने आया है की जो अभी आर्थिक आधार पर आरक्षण की माँग कर रहे है,वें या उनके किसी पूर्वज ने,जब आरक्षण नहीं था तब sc,st और obc के हितों में कितनी आवाज़ उठायी थी या आंदोलन किए थे?

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